
जैन बगीचे में श्रेयांशप्रभ जी का चातुर्मासिक प्रवचन
राजनांदगांव। “हम सैकड़ो पेड़ काट देते हैं और केवल कुछ पेड़ ही उगाते हैं और यह भी निश्चित नहीं है कि सभी पेड़ जागृत हों। पेड़, नदी, हवाएं हमको देती ही है बदले में कुछ नहीं मांगती, उल्टे अपनी अपेक्षाओं की वजह से मनुष्य उनका बेहताशा दोहन ही करता है। ऐसी स्थिति में ऑक्सीजन कम तो होगा ही। हम प्रकृति का संतुलन जो बिगाड़ रहे हैं।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्लभ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने फरमाया कि अपेक्षाएं होंगी ,विचार आएंगे लेकिन इन्हें ज्यादा देर टिकने नहीं देना चाहिए। यदि हम अपनी अपेक्षाएं नहीं रोक सकते तो अपेक्षाओं की पूर्ति करना बंद कर दो। हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे को अमुक व्यक्ति से ऐसा व्यवहार मिले। आप अपेक्षा करना बंद कर दें और आगे बड़े किंतु अपेक्षाओं के साथ नहीं बल्कि आशाओं के साथ। अपेक्षा सपोर्ट नहीं करता बल्कि आशाएं सपोर्ट करती है। आशाओं पर भी आश्रित मत रहो। आप किसी पर भी डिपेंड मत हो।
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि कभी किसी को झूठी आशा मत दो। आप जितना कर सकते हो, उतना ही करो। आपकी इच्छाओं की पूर्ति जहां नहीं हो रही है वहां आप एक पल भी टिकना नहीं चाहते और जहाँ आपकी इच्छाएं पूरी हो रही है,आप वहां से हटना नहीं चाहते। यह तो आपका स्वार्थीपन है। हम अपनी अपेक्षाओं से खुद को नीचा गिराने लगते हैं और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा करते हैं। उन्होंने कहा कि केवल मारना ही हिंसा नहीं होता बल्कि दिल तोड़ना भी हिंसा है।
मुनिश्री ने कहा कि हमारी जब भी अपेक्षाएं जागती है तो पेड़ को याद कर लेना चाहिए जो बिना कुछ पाये ही हमें सब कुछ देता है। आप अपना काम करते जाओ आपको सब कुछ अपने आप ही मिलेगा। आप कुछ पाने की कामना मत करो, आपके भाग्य में जो लिखा है वह आपको अपने आप ही मिल जाएगा।

