
स्थानीय कलाकारों को संरक्षण देने की उठी मांग
जितेंद्र जैन जीतू
राजनांदगांव। गणेश विसर्जन के अवसर पर निकलने वाली नयनाभिराम झांकियों का इतिहास दशकों पुराना और गौरवमयी रहा है। अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर से ही पूरे अंचल में राजनांदगाँव की झांकियों की ख्याति रही है। आलम यह रहता था कि विसर्जन उत्सव और झांकी कारवां में उमड़ने वाले विशाल जनसैलाब को नियंत्रित करने के लिए अन्य जिलों से विशेष पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ती थी। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद भी शहर ने इस सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखा है, लेकिन बदलते वक्त के साथ इस गौरवशाली परंपरा के मूल स्वरूप पर ‘रेडिमेड संस्कृति’ का साया गहराने लगा है।
रेडिमेड के दौर में भी ‘लोकल कारीगरी’ की चमक बरकरार: एक दौर था जब गणेश उत्सव शुरू होने से महीनों पहले शहर के विभिन्न मोहल्लों में गणेश मंडली के युवा और कार्यकर्ता रात-दिन एक कर झांकियों का ताना-बाना बुनते थे। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में यह बदलाव आया है कि शहर के कुछ बड़े उत्सव मंडल पड़ोसी जिले दुर्ग से तैयार झांकियां किराए पर या खरीदकर ला रहे हैं। इसके बावजूद, राजनांदगांव के कई समर्पित मंडल आज भी पारंपरिक रूप से स्वयं यहीं झांकियों का निर्माण करते हैं। स्थानीय मंडलों की यह मौलिक व स्वनिर्मित झांकियां भव्यता और रचनात्मकता में आज भी बाहर से आने वाली रेडिमेड झांकियों को कड़ी मात देती हैं।
जब राजधानी रायपुर से झांकियां लेने आते थे आयोजक: शहर के वरिष्ठजनों और कलाकारों के अनुसार, राजनांदगांव की झांकी कला का डंका इस कदर बजता था कि रायपुर के बड़े-बड़े गणेश मंडल वाले विसर्जन के दिन राजनांदगांव पहुंचते थे। यहां विसर्जन समाप्त होने के बाद वे इन झांकियों को किराए पर लेकर राजधानी ले जाते थे, जहां अगले दिन उनका भव्य प्रदर्शन होता था। अपनी सोच, मेहनत और हुनर से तराशी गई झांकियों की जीवंतता का आनंद ही उस समय निराला हुआ करता था।
स्थानीय हुनरमंदों से छिन रहा रोजगार: स्थानीय स्तर पर झांकियों के निर्माण से शहर की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती थी। महीनों पहले से शुरू होने वाले निर्माण कार्य से स्थानीय कलाकारों, मूर्तिकारों, पेंटरों, कारपेंटरों, साउंड-लाइट टेक्नीशियनों और वेल्डिंग कारीगरों समेत दर्जनों परिवारों को सीधा रोजगार और आजीविका मिलती थी। अब दुर्ग से रेडिमेड झांकियां मंगाने के चलन से स्थानीय कलाकारों का मनोबल टूट रहा है और जिसके चलते शहर का हुनर व व्यापार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
नगर निगम से मांग केवल स्थानीय झांकियों को मिले स्पर्धा में स्थान: विदित हो कि नगर पालिक निगम और कुछ संस्थाओं द्वारा हर वर्ष विसर्जन के दौरान निकलने वाली आकर्षक झांकियों को प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान देकर पुरस्कृत किया जाता है। विडंबना यह है कि इस प्रतिस्पर्धा में बाहर (दुर्ग) से लाई गई रेडिमेड झांकियां भी शामिल हो जाती हैं। संस्कृति प्रेमियों, स्थानीय कलाकारों और जागरूक नागरिकों ने नगर निगम प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि नगर निगम की आधिकारिक झांकी स्पर्धा में केवल उन्हीं झांकियों को सम्मिलित व मूल्यांकित किया जाए, जिनका वास्तविक निर्माण राजनांदगांव नगर सीमा के भीतर स्थानीय मंडलों व कारीगरों द्वारा किया गया हो।
बाहर से मंगाई गई रेडिमेड झांकियों को प्रदर्शन की अनुमति भले मिले, लेकिन उन्हें आधिकारिक प्रतियोगिता व पुरस्कार की दौड़ से बाहर रखा जाए।
नागरिकों का कहना है कि यदि निगम यह निर्णायक नियम लागू करता है, तो शहर में पुनः स्थानीय स्तर पर झांकी निर्माण का दौर लौटेगा, युवाओं में रचनात्मक ऊर्जा का संचार होगा और संस्कारधानी के हुनरमंदों को उनके ही शहर में रोजगार व उचित सम्मान मिल सकेगा।


