
सड़कों पर दुर्घटनाग्रस्त बेसहारा गोवंश, युवाओं के भरोसे इलाज, लाखों के अनुदान के बाद भी सवालों के घेरे में ‘पिंजरा पोल’ और प्रदेश की कई संस्थाएं
जितेंद्र जैन जीतू, राजनांदगाँव
राजनांदगांव। ‘पिंजरा पोल’ यानी वह सुरक्षित बाड़ा जहां बूढ़े, अशक्त, लाचार और बेसहारा गोवंश को संरक्षण मिले। लेकिन जमीनी हकीकत इस मूल परिभाषा से कोसों दूर जा चुकी है। शहर की दशकों पुरानी प्रतिष्ठित संस्था ‘गौशाला पिंजरा पोल’ को लेकर आज आमजन के मन में कई तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार से गौ-संरक्षण के नाम पर मिलने वाले लाखों रुपये के अनुदान, लखोली स्थित मुक्तिधाम के जीर्णोद्धार के लिए शासकीय फंड और संस्था की दुकानों से आने वाले भारी किराए के बावजूद, सड़क पर बेसहारा तड़पती गायों को इस गौशाला की चौखट तक नसीब नहीं हो पा रही है।
यह समस्या अकेले संस्कारधानी राजनांदगांव की नहीं, बल्कि समूचे राज्य में उन अधिकांश सरकारी अनुदान प्राप्त गौशालाओं की है जो सेवा के नाम पर बनीं, पर अब केवल व्यापारिक और प्रबंधकीय सुख-सुविधाओं का केंद्र बनकर रह गई हैं।
संस्था में वर्षों से राजनीतिक रसूख रखने वाले दिग्गज पदाधिकारी काबिज हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता खूबचंद पारख के मार्गदर्शन में चलने वाली इस संस्था के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है। बेशकीमती जमीनें, दर्जनों दुकानें और सरकार से मिलने वाला नियमित चारा-अनुदान।
बावजूद इसके, शहरवासियों का सीधा सवाल है। क्या गौशाला का काम सिर्फ दुधारू गायों का दूध बेचकर मुनाफा कमाना है? क्या गौ–संरक्षण के नाम पर मिली जमीनों पर दुकानें तानकर किराया वसूलना ही गौशाला का मूल उद्देश्य रह गया है? यदि संस्था आत्मनिर्भर होकर व्यावसायिक गतिविधियों से ही चल रही है, तो जनता के टैक्स के पैसे से शासकीय अनुदान किस औचित्य पर दिया जा रहा है? जब गौशाला मौजूद है, तो 1000 गायों के ‘कांजी हाउस’ का शिगूफा क्यों!
शहर की सड़कों पर जब लावारिस मवेशियों का जमावड़ा लगता है और आए दिन होने वाले हादसों पर अखबारों में खबरें छपती हैं, तब यही संचालक प्रशासन के सामने यह तर्क रखते हैं कि समस्या से निपटने के लिए शहर में 1000 गायों की क्षमता वाला नया कांजी हाउस (पशु फाटक) बनाया जाए।
यह तर्क अपने आप में व्यवस्था पर तमाचा है। जब शहर के बीचों-बीच एकड़ों में फैली ऐतिहासिक गौशाला मौजूद है, तो बेसहारा मवेशियों को वहां पनाह देने से परहेज क्यों? क्या सड़क की लावारिस, बीमार और वृद्ध गायें इस संस्था के परिसर में प्रवेश पाने की हकदार नहीं हैं?
सड़क पर किसी तेज रफ्तार वाहन की चपेट में आकर जब कोई गोवंश लहूलुहान होकर तड़प रहा होता है, तब न तो गौशाला का एम्बुलेंस पहुंचता है और न ही संस्था के डॉक्टर। ऐसे वक्त में शहर के कुछ संवेदनशील नवयुवक और निस्वार्थ संस्थाएं बिना किसी सरकारी मदद, बिना किसी तामझाम के चंदा जुटाकर सड़क पर ही इलाज करते दिखते हैं।
गंभीर रूप से बीमार गायों की ड्रेसिंग, दवाइयों से लेकर चारे तक की जिम्मेदारी ये युवा अपनी जेब से उठाते हैं। बड़ा सवाल यह है कि जिस संस्थान को सरकार मूक पशुओं के इलाज और चारे के नाम पर बजट देती है, उसका चिकित्सा कक्ष और बाड़े ऐसे समय में लाचार गोवंश के लिए क्यों नहीं खुलते?
प्रदेश में ही खैरागढ़ रोड स्थित ‘मनोहर गौशाला’ जैसी संस्थाएं भी मौजूद हैं, जो नवाचार, गो-उत्पाद, वैज्ञानिक पद्धति और सच्ची सेवा के चलते राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। वहां का प्रबंधन साबित करता है कि इच्छाशक्ति हो तो गौशालाएं समाज और गोवंश दोनों के लिए मिसाल बन सकती हैं। इसके विपरीत, राजनांदगांव की पारंपरिक गौशाला वर्षों से रसूखदारों के नियंत्रण में होने के बाद भी केवल यथास्थिति बनाए रखने और आय-व्यय के कागजी आंकड़ों तक सीमित है।
गौशाला सिर्फ गायों को बांधकर दूध निकालने का खटाल नहीं है। गौशाला का मूल संविधान मूक, बेसहारा और दुर्घटनाग्रस्त जीवों को आश्रय और जीवनदान देना है। यदि सरकारी जमीन और शासकीय अनुदान पाने वाली संस्थाएं इन लाचार मवेशियों से मुंह मोड़ेंगी, तो प्रशासन को इनकी कार्यप्रणाली की उच्चस्तरीय समीक्षा करनी चाहिए। शहर की जनता अब रसूख नहीं, पारदर्शी सेवा और सड़कों पर सुरक्षित गोवंश देखना चाहती है।


