
आईवीएफ से तैयार भ्रूण साहीवाल गाय में किया गया प्रत्यारोपित, देसी नस्ल के संरक्षण और गुणन की उम्मीद
देहरादून। उत्तराखंड की देशी बद्री नस्ल के संरक्षण और आनुवंशिक सुधार की दिशा में वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। ओवम पिक-अप (ओपीयू) और इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक से तैयार बद्री भ्रूण को साहीवाल गाय में प्रत्यारोपित किया गया, जिससे 11 सितंबर को एक स्वस्थ बद्री बछिया का जन्म हुआ है।
यह उपलब्धि करनाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) और पंतनगर स्थित जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सहयोग से हासिल हुई है। इस कार्यक्रम में उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी ने आर्थिक सहयोग दिया है।
इस प्रक्रिया में आनुवंशिक रूप से बेहतर चुनी गई बद्री गायों से अल्ट्रासाउंड की मदद से अंडाणु निकाले गए। इन्हें प्रयोगशाला में परिपक्व करने के बाद बेहतर बद्री सांड के वीर्य से निषेचित किया गया। इससे तैयार भ्रूण को प्रयोगशाला में विकसित करने के बाद साहीवाल गाय में प्रत्यारोपित किया गया।
गर्भधारण करने वाली गाय साहीवाल थी, लेकिन भ्रूण बद्री नस्ल का होने के कारण जन्मी बछिया बद्री नस्ल की है। इसी वजह से इसे आम तौर पर ‘परखनली में जन्म’ जैसी भाषा में समझा जा सकता है, हालांकि वैज्ञानिक प्रक्रिया में भ्रूण का विकास और जन्म गाय के गर्भ में ही हुआ।
ओपीयू-आईवीएफ तकनीक का महत्व इस बात में है कि आनुवंशिक रूप से बेहतर मादा पशुओं से अपेक्षाकृत कम समय में कई भ्रूण तैयार किए जा सकते हैं। इससे अच्छे आनुवंशिक गुणों वाले बद्री मवेशियों की संख्या बढ़ाने और मूल्यवान जर्मप्लाज्म को संरक्षित करने की संभावना बढ़ती है।
आईसीएआर-एनडीआरआई के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने कहा कि ओपीयू-आईवीएफ जैसी उन्नत प्रजनन तकनीकें बेहतर मादा जर्मप्लाज्म के तेजी से गुणन में मदद कर सकती हैं और बद्री नस्ल के संरक्षण तथा आनुवंशिक सुधार के लिए व्यवस्थित कार्यक्रम का आधार बन सकती हैं।
बद्री जर्मप्लाज्म के संरक्षण और गुणन के लिए यह अनुसंधान कार्यक्रम 2023 में जीबी पंत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एमएस चौहान की पहल पर शुरू हुआ था। पिछले तीन वर्षों में दोनों संस्थानों की वैज्ञानिक टीमों ने बद्री नस्ल के लिए ओपीयू-आईवीएफ, भ्रूण उत्पादन और भ्रूण प्रत्यारोपण की प्रक्रियाएं विकसित कीं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, एक अन्य प्राप्तकर्ता गाय से भी अगले 5 से 7 दिनों में बद्री बछड़े के जन्म की उम्मीद है।
इस कार्यक्रम के तहत अधिक दूध देने वाली और आनुवंशिक रूप से बेहतर बद्री गायों की क्लोनिंग पर भी काम चल रहा है। वैज्ञानिक टीम क्लोन किए गए बद्री भ्रूण तैयार कर चुकी है। अगले चरण में इन भ्रूणों को उपयुक्त साहीवाल, संकरित और बद्री गायों में प्रत्यारोपित करने की योजना है।
बद्री मवेशी उत्तराखंड का महत्वपूर्ण देशी आनुवंशिक संसाधन हैं और राज्य पशु माने जाते हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि उन्नत प्रजनन तकनीक के जरिए इस नस्ल के बेहतर आनुवंशिक गुणों को संरक्षित करते हुए उसकी संख्या बढ़ाने का रास्ता तैयार किया जा सकेगा। (साभार केवल कृष्ण)


