राजनांदगांव से आती हैं रायपुर की गणेश विसर्जन झांकियां

बाल समाज राजनांदगाँव की पहली झांकी

डॉ. गीतेश अमरोहित, रायपुर

28 सितम्बर को शहर में गणेश विसर्जन की झांकियां निकलेंगी। इनमें अधिकांश झांकियां एक दिन पहले राजनांदगांव की गणेश विसर्जन झांकी में प्रदर्शित हो चुकी होती हैं। 1935 में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजनांदगांव में गणेश झांकी की परंपरा शुरू हुई। ब्रिटिश शासन में लोगों को एक जगह इकट्ठा होने और बैठक करने पर रोक थी। लोकमानय बाल गंगाधर तिलक के गणेश उत्सव के विचार से प्रेरित होकर गणेश उत्सव को लोगों से जोड़ने का माध्यम बनाया। ़इसी के तहत बाल समाज समिति ने झांकी की शुरूवात की। पहली झांकी ठेले और बैलागाड़ी पर फूल व केले के पेड़ों से सजाकर बनाई गई थी। फिर सिंगल जीप पर मिट्टी की स्थिर मूर्तियां का दौर आया। इसके बाद मूर्तियों में हाथ, मुंह और गर्दन हिलने लगी और फाइबर की मूर्तियों के साथ झांकियों में नई तकनीक जुड़ती गई। अब तीन-चार जीप जोड़कर 60 से 70 फीट तक लंबी झांकियां तैयार होने लगी है। मतलब जिस झांकी की शुरूवात साधारण सजावट और एक प्रतिमा से हुई थी, वह अब चलती-फिरती प्रस्तुति का रूप ले चुकी है। झांकी में लाइट की सजावट भी बढ़ने लगी है। 1970-75 के आसपास जीप का दौर आया। उसके बाद राजनांदगांव की झांकियां रायपुर के साथ दुर्ग, डोंगरगढ़, बालाघाट जाने लगी। फिर रायपुर से झांकियां दुर्गोत्सव में बिलासपुर पहुंचने लगी। शुरूवाती दौर में राजनांदगांव की समितियां अपने खर्चे से झांकियां बनवाती थीं। फिर राजनांदगांव में विसर्जन झांकी के दौरान रायपुर, दुर्ग की समितियां अपनी मनपसंद झांकी का मोलभाव कर खरीद लेती थीं। बाद में राजनांदगांव और रायपुर की समितियां संयुक्त खर्चे में झांकियांे का निर्माण करने लगीं। आजकल कई झांकी बनाने वाले कारीगर हैं, जो समितियों को झांकियां किराए पर देती हैं। सामान्यतः तीन जीप वाली झांकी निर्माण में 7 से 8 लाख का खर्च आता है।
परंपरा है कि राजनांदगांव में झांकी तिथि के ठीक दूसरे दिन रायपुर में विसर्जन झांकी निकलती है। राजनांदगांव में झांकी के दूसरे दिन राजनांदगांव से रायपुर हाइवे पर लगातार झांकियां रायपुर की ओर आती रहती हैं।
तो कल आप भी रायपुर के विसर्जन झांकी में झांकी के उत्साह के साथ शामिल होइए।

तस्वीर – राजनांदगांव बाल समाज की पहली झांकी

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