
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
“प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा!”
फिल्म बॉबी का ये अमर डायलॉग तो सबने सुना ही होगा, ये सबका प्रिय डायलॉग है लेकिन इसे लेकर खुद प्रेम चोपड़ा बिल्कुल खुश नहीं थे।
साल 1973 में जब शोमैन राज कपूर अपनी फिल्म बॉबी बना रहे थे, तब उन्होंने प्रेम चोपड़ा को फिल्म के क्लाइमैक्स में एक छोटे से रोल के लिए बुलाया और प्रेम चोपड़ा को सिर्फ एक ही लाइन बोलने के लिए दी-
प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा।
प्रेम चोपड़ा हैरान रह गए। वे सीधे राज कपूर के पास पहुंचे और परेशान होकर बोले,
“ राज साहब, मैं इतना बड़ा विलेन हूँ, लोग मुझे देखने आते हैं, और आप मुझे सिर्फ एक लाइन का रोल दे रहे हैं? कुछ और दमदार डायलॉग तो दीजिए।”
तब राज कपूर ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा, “प्रेम, अगर यह फिल्म हिट हुई, तो तुम्हारा ये एक छोटा सा डायलॉग पूरी जिंदगी लोगों की जुबान पर रहेगा।”
राज साहब की बात एकदम सच साबित हुई। फिल्म रिलीज होने के इतने साल बाद भी ये डायलॉग अक्सर लोग बोल देते हैं।
फिल्मों में उनकी विलेन वाली छवि इतनी तगड़ी हो गई थी कि असल जिंदगी में लोग उनसे सचमुच डरने लगे थे।
प्रेम चोपड़ा ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब वह फिल्मों में एक बड़े विलेन बन चुके थे, तब वो चंडीगढ़ में अपने माता-पिता से मिलने गए
एक शाम वो अपने पिता के साथ सड़क पर टहल रहे थे। सामने से कुछ लोग आ रहे थे, लेकिन जैसे ही उनकी नजर प्रेम चोपड़ा पर पड़ी, वे घबरा गए और जोर-जबरदस्ती से चिल्लाने लगे,
“ भागो! अपनी पत्नियों को छुपाओ, प्रेम चोपड़ा आ रहा है!”
ये सुनकर उनके पिता हैरान रह गए और उन्होंने परेशान होकर कहा,
“मैंने तो सुना था कि तुम मुंबई में बहुत लोकप्रिय हो गए हो, लेकिन यहाँ तो लोग तुमसे डरते हैं और भाग रहे हैं!”
इसके बाद प्रेम चोपड़ा ने उन लोगों को बुलाकर उनसे हाथ मिलाया और उन्हें समझाया कि वे असल जिंदगी में एक शरीफ इंसान हैं।
इस विलेन इमेज का असर उनके खुद के घर पर भी पड़ा।
एक बार वे अपनी छोटी बेटी को अपनी फिल्म का प्रीमियर दिखाने थियेटर ले गए थे।
फिल्म में जब उनकी बेटी ने अपने पिता को परदे पर महिलाओं के साथ बदसलूकी करते और हीरो से मार खाते देखा, तो वो बुरी तरह डर गई।
थियेटर से बाहर निकलने के बाद भी वो पूरी तरह सहमी रही और अपने पिता को अजीब नजरों से घूरती रही।
घर आने के बाद भी उसने कई दिनों तक अपने पिता से बात नहीं की।
बाद में प्रेम चोपड़ा को बड़े प्यार से उसे समझाना पड़ा कि “बेटा, परदे पर जो तुम देखती हो, वह सिर्फ मेरा काम है। असलियत में मैं ऐसा बिल्कुल नहीं हूँ।
शिमला से जब प्रेम चोपड़ा मुंबई आए, तो उनके पिता ने कहा था कि सिर्फ एक्टिंग के भरोसे मत रहो, कोई नौकरी भी कर लो।
तब उन्होंने द टाइम्स ऑफ इंडिया के सर्कुलेशन विभाग में नौकरी कर ली। काम के सिलसिले में उन्हें महीने में 20 दिन बंगाल, ओडिशा और बिहार के दौरों पर रहना पड़ता था।
लेकिन एक्टिंग का भूत तो सवार था ही…फिल्मों के ऑडिशन के लिए समय निकालने के लिए उन्होंने एक तरकीब लगाई।
वे अपने लोकल एजेंट्स को फोन करके पहले ही रेलवे स्टेशन पर बुला लेते थे और ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर रुकते ही फटाफट सारा कागजी काम निपटा लेते थे।
इस जुगाड़ से जो दौरा 20 दिन का था, उसे वे 12 दिन में खत्म कर लेते और बाकी बचे 8 दिन मुंबई के स्टूडियोज के चक्कर काटते थे।
जैसे मुंबई हर कोई फ़िल्म इंडस्ट्री में हीरो बनने आता है, वैसे ही प्रेम चोपड़ा भी हीरो बनने आए थे… लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, और वे बन गए हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े और सबसे शातिर विलेन..
प्रेम चोपड़ा ने अपने करियर की शुरुआत विलेन से नहीं, बल्कि एक हीरो के रूप में की थी। साल 1960 में आई सुपरहिट पंजाबी फिल्म चौधरी करनैल सिंह में वे लीड एक्टर बने, और इस फिल्म को नेशनल अवार्ड भी मिला था।
इसके बाद उन्होंने कुछ फिल्मों में सीधे-साधे पॉजिटिव रोल भी किए। लेकिन उन्हें वो बड़ी कामयाबी और पहचान नहीं मिल पा रही थी, जिसका वे सपना लेकर मुंबई आए थे।
जब प्रेम चोपड़ा मुंबई के स्टूडियोज के चक्कर काट रहे थे, तब उनके दोस्त और मशहूर अभिनेता मनोज कुमार ने उन्हें एक सलाह दी।
मनोज कुमार ने उनसे कहा, “प्रेम, तुम हीरो बनने की जिद छोड़ो। तुम्हारी आवाज और तुम्हारी आँखों का अंदाज एक विलेन के रूप में कमाल कर सकता है। अगर तुम विलेन बनते हो, तो इंडस्ट्री में सालों-साल राज करोगे।
प्रेम चोपड़ा को यह बात समझ आ गई। इसके बाद उन्हें साल 1964 में राज खोसला की सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म वो कौन थी में एक नेगेटिव किरदार निभाने का मौका मिला।
फिल्म सुपरहिट रही और लोगों को इस नए लड़के का शातिर अंदाज पसंद आया।
इसके बाद 1967 में मनोज कुमार ने अपनी फिल्म उपकार में उन्हें मुख्य विलेन चरणदास का रोल दिया। इस फिल्म के बाद तो जैसे बॉलीवुड को उसका नया और सबसे खौफनाक खलनायक मिल गया।
जब प्रेम चोपड़ा ने पूरी तरह से फिल्मों में विलेन के रोल करने शुरू किए, तो उनके पिता उनसे काफी नाराज हो गए थे।
उनके पिता शिमला में एक प्रतिष्ठित सरकारी अधिकारी थे।
जब उन्होंने देखा कि उनका बेटा परदे पर सिर्फ चोर, डाकू और गुंडों के रोल कर रहा है, तो उन्होंने प्रेम चोपड़ा से कहा,
“क्या इसीलिए तुम्हें मुंबई भेजा था? तुम परदे पर ऐसे गंदे काम करते हो कि लोग तुम्हें देखकर अपनी पत्नियां छुपाने लगते हैं!”
हालांकि, बाद में जब उन्होंने देखा कि विलेन के रूप में भी उनका बेटा कितनी इज्जत और शोहरत कमा रहा है, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
उस दौर में विलेन का मतलब होता था बड़ी-बड़ी मूंछें, हाथ में कोड़ा या गन, और जोर-जोर से चिल्लाने वाला डाकू।
लेकिन प्रेम चोपड़ा ने विलेन की इस परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया। वे परदे पर एकदम सूट-बूट पहनकर, अमीर, पढ़े-लिखे और सभ्य दिखने वाले विलेन बनकर आए, जो चिल्लाने के बजाय बहुत धीमी और ठंडी आवाज में बात करता था और कहता था
“प्रेम नाम है मेरा… प्रेम चोपड़ा
और इसी से मिलता जुलता एक डायलॉग
अजगर नाम है मेरा, मैं डसता नहीं निगल जाता हूँ..
क्या आप बता सकते हैं कि ये उनकी कौन सी फ़िल्म का डायलॉग है?
प्रेम चोपड़ा साहब को जन्मदिन की शुभकामनाएँ
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