बॉलीवुड की सबसे भावुक और दिल को झकझोरने वाली फिल्म है सदमा

climax देख नम हो जाती हैं आँखें

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

अगर आपसे पूछा जाए कि बॉलीवुड की सबसे भावुक और दिल को झकझोरने वाली फ़िल्म कौन सी है, तो पक्के तौर पर आप सदमा का नाम लेंगे..

आज 40 से ज़्यादा साल बीत जाने के बाद भी, इस फ़िल्म का Climax देखकर लोगों की आँखें नम हो जाती हैं।
कमल हासन और श्रीदेवी की शानदार एक्टिंग से सजी ये फ़िल्म भारतीय सिनेमा की एक ऐसी कल्ट क्लासिक है, जिसे हर सिनेमा प्रेमी को कम से कम एक बार तो ज़रूर देखना चाहिए।

फ़िल्म की कहानी के अनुसार, श्रीदेवी एक कार एक्सीडेंट में अपनी याददाश्त खो बैठती है। दिमागी चोट के कारण उसकी मानसिक स्थिति बच्चों जैसी हो जाती है। इस हालत में वह अपनों से बिछड़कर एक ख़राब जगह पहुँच जाती है।

वहाँ से उसे कमल हसन बचाकर लाते और उसकी देखभाल करते हैं, फिर उन्हें, श्रीदेवी से प्यार हो जाता है, लेकिन अचानक श्रीदेवी की याददाश्त वापस आ जाती है,
एंड में रेलवे स्टेशन पर कमल हासन उसे याद दिलाने की पागलों की तरह कोशिश करते हैं, लेकिन वो उसे एक अजनबी समझकर ट्रेन में बैठकर चली जाती है।

आह 💔! ये सीन दर्शकों का दिल दहला देने वाला था…
ये फिल्म एक रोमांटिक ड्रामा फ़िल्म थी जिसका निर्देशन और लेखन बालू महेंद्र ने किया था.. ये फ़िल्म इनकी ही 1982 की सुपरहिट तमिल फ़िल्म मूनराम पिरई की आधिकारिक रीमेक थी…
और इस तमिल फ़िल्म में भी लीड रोल कमल हासन, श्रीदेवी ने निभाये थे..

श्रीदेवी ने इस फ़िल्म में अपना रोल काफ़ी संजीदगी से निभाया था,
लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस तमिल फ़िल्म में उनके अभिनय को मील का पत्थर माना जाता है, जब बालू महेंद्र ने उसका हिंदी रीमेक बनाने की घोषणा की तो उनकी पसंद श्रीदेवी नहीं, डिंपल कपाड़िया थी..
लेकिन डिंपल कपाड़िया ने मना कर दिया था तब ये रोल फिर से निभाने का मौक़ा श्रीदेवी को मिला था और उन्होंने एक बार फिर अपने अभिनय से सबका दिल जीत लिया..

फ़िल्म का रेलवे स्टेशन का क्लाइमेक्स सीन जहाँ कमल हासन का किरदार चलती ट्रेन के आगे पागलों की तरह नाचता, रोता और चिल्लाता है, जिसे देखकर दर्शकों की आँखे भीग जाती है..
जब इस सीन की शूटिंग चल रही थी तो अचानक ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई।
लेकिन निर्देशक बालू महेंद्र ने शूटिंग रोकने के बजाय उसी बारिश में सीन जारी रखने का फ़ैसला किया, जिसने सीन के दर्द को और गहरा कर दिया।
इसी सीन में जब कमल हासन दौड़ रहे होते हैं, तो उनका सिर स्टेशन के एक खंभे से ज़ोर से टकरा जाता है और ये कोई एक्टिंग नहीं थी बल्कि दौड़ते हुए सच में उनका सिर टकरा गया था इसके बावजूद कमल हासन ने शॉट नहीं रोका और दर्द में ही परफॉर्म करते रहे जिससे सीन और ज़्यादा भावुक हो गया था..

दरअसल क्लाइमेक्स को बालू महेंद्र ने बहुत ही साधारण और शांत लिखा था, जिसमें श्रीदेवी ट्रेन में बैठकर चली जाती है और कमल हासन के किरदार को बस उदास होकर ट्रेन को जाते देखना था.
लेकिन कमल हासन का मानना था कि दर्शकों को झकझोरने के लिए उनके किरदार का पागलपन और लाचारी खुलकर दिखनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने इस सीन में ड्रामैटिक सीक्वेंस रखने का सुझाव दिया, जो बाद में इतिहास बन गया..

फ़िल्म का खूबसूरत संगीत दिग्गज संगीतकार इलयराजा ने दिया था। दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म के गानों की रिकॉर्डिंग के दौरान, ऑस्कर विनर ए.आर. रहमान तब वे दिलीप कुमार नाम से जाने जाते थे, इलयराजा के साथ बतौर कीबोर्ड प्लेयर काम कर रहे थे।

फ़िल्म की शूटिंग के दौरान निर्देशक बालू महेंद्र, कमल हासन और श्रीदेवी यहाँ तक कि फ़िल्म के संगीतकार इलयराजा इन सबकी हिंदी उस समय कमजोर थी।
ऐसे में फ़िल्म के संवादों में जान फूंकने का काम मशहूर लेखक गुलज़ार ने किया। उनके लिखे डायलॉग्स और ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले…जैसे गानों ने फ़िल्म को अमर बना दिया।

जब ये फ़िल्म 8 जुलाई 1983 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, तो इसके दर्दनाक और उदास कर देने वाले क्लाइमेक्स की वजह से दर्शकों ने इसे सिनेमाघरों में नकार दिया और यह बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही।
लोगों को कमल हासन और श्रीदेवी का बिछड़ना बर्दाश्त नहीं हुआ,

लेकिन जब ये फ़िल्म वीसीआर और टीवी पर आई, तो लोगों ने इसके अभिनय, संगीत और निर्देशन की गहराई को समझा और आज इसे भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में से एक माना जाता है।

अगर आपने अब तक यह फ़िल्म नहीं देखी है, तो अपना दिल मजबूत करके इसे एक बार ज़रूर देखें.. और मुझे बताएँ कि

“बॉलीवुड की सबसे भावुक और दिल झकझोरने वाली फिल्म कौन सी है आपकी नज़र में..?”

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