
जैन बगीचे में श्रेयांशप्रभ जी का चातुर्मासिक प्रवचन
राजनांदगांव। “हर वस्तु एवं स्थान का अपना अलग ही महत्व होता है। हमारे हर काम में पारदर्शिता होनी चाहिए। आप जैसा हैं वैसा ही रहें। भीतर कुछ और बाहर कुछ और मानसिकता के लोग कभी भी सम्मान नहीं पाते।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने फरमाया कि व्यक्ति को हमेशा नैतिक रहना चाहिए। वैचारिक मतभेदों की वजह से जिन घरों में तलाक की नौबत पहुंच जाती है, वह घर अवस्थित हो जाता है। अक्सर यह घर की व्यवस्था को बिगाड़ देता है। कभी भी तत्काल निर्णय नहीं लेना चाहिए। तत्काल निर्णय, कहीं बाद में पछतावा का कारण न बन जाये। पहले दोनों पक्षों को सुने और फिर कोई फैसला लें तभी आपका फैसला सही होगा।
मुनि श्री ने कहा कि आप विनम्र रहे और बड़ों के प्रति ही नहीं बल्कि छोटों के प्रति भी आपका विनम्र भाव रहे। सबको सम्मान दें। आपके व्यवहार से किसी के दिल को ठेस न पहुंचे। इसके लिए आपको सहज रहना होगा और यह तभी हो सकता है जब आप दूसरे की बातों को सुने और उचित व्यवहार करें।

