
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
स्वरा भास्कर जब फ़िल्म पद्मावत देखने गई थीं तब उन्होंने फ़िल्म देखने बाद अपना अनुभव शेयर नहीं किया था.. लेकिन ना जाने क्यों फ़िल्म देखने के इतने सालों बाद उन्हें याद आया कि अरे! मैंने तो फ़िल्म का रिव्यू ही नहीं किया..
तब वो दिल्ली के ICC इवेंट पर पहुँची एक बार फिर इतिहास पर अपना नफ़रत से भरा रिव्यू दिया..
अरे भाई, जब मैंने थिएटर में पद्मावत फिल्म का वो क्लाइमेक्स देखा, जहाँ 800 महिलाओ को आग में कूदते देखा तो मेरे मुंह से निकला था..
छी!
भगवान न करे अगर मैं कोई रेप सर्वाइवर होती, तो ये फिल्म मुझसे क्या कह रही है कि मैं एक कायर हूँ क्योंकि मैंने अपनी इज्जत बचाने के लिए खुद को जान से नहीं मारा?
क्या आप हमारे देश जैसे समाज में, जहाँ वैसे ही रेप की बाढ़ आई हुई है, सर्वाइवर्स को यह मैसेज देना चाहते हो कि तुम्हारा जिंदा रहने का कोई हक ही नहीं था?
क्या अगर तुम सच में एक सम्मानित और बहादुर औरत होतीं, तो तुम्हें खुद को मार लेना चाहिए था? क्या बलात्कार किसी महिला की जिंदगी का अंत है?
वहाँ एक प्रेग्नेंट औरत के पेट का क्लोज-अप शॉट दिखाया जाता है जो जौहर की तरफ बढ़ रही है।
यानी तुम यह कहना चाह रहे हो कि वो बच्चा जो शायद एक लड़की हो सकती है, उसे पैदा होने का हक ही नहीं है क्योंकि भविष्य में कोई मुस्लिम शासक उसका रेप कर सकता है?
तीन घंटे की फिल्म देखने के बाद मुझे ऐसा लगा कि एक औरत के तौर पर मेरा वजूद सिर्फ मेरी योनि तक ही सीमित करके रख दिया गया है!
पढ़ लिया रिव्यू..?
अब स्वरा जी ने रिव्यू दिया है तो उस रिव्यू पर प्रतिक्रिया भी तो दर्शकों को देनी चाहिए…
स्वरा भास्कर ने अपनी नफरत और एजेंडे में छी तो बोल दिया, लेकिन वो ये भूल गईं कि उन्हें छी किस पर बोलना चाहिए था..?
उस फिल्म के सीन पर या फिर उस दौर के उन आक्रांताओं की दरिंदगी पर..जिनकी वजह से औरतों को ये कदम उठाना पड़ता था। जिस प्रेग्नेंट शॉट की वो बात कर रही हैं , उन्हें उसी शॉट से समझ जाना चाहिए था कि कितनी दरिंदगी होती होगी जो वो अपने अजन्मे बच्चे के साथ जौहर करती थी..
स्वरा आज एसी रूम में बैठकर ज्ञान दे रही हैं, लेकिन इतिहास की असलियत क्या थी..?
अलाउद्दीन खिलजी या आक्रांताओं की सेना जब किसी राजपूत राजा से किसी किले को जीतती थी, तो वे औरतों को सिर्फ मारते नहीं थे। वे हजारों औरतों का सामूहिक बला-त्कार करते थे, उनके स्त-न काट देते थे, उन्हें नग्न करके बाजारों में पशुओं की तरह बेचते थे और जिंदगी भर अपने हरम में रखकर उनका यौन शोषण करते थे और मरने के बाद भी उनकी लाSH के साथ दुराचार करते थे…
इतिहास गवाह है कि आक्रांताओं के कब्जे में जाने के बाद महिलाओं की जिंदगी मौत से भी बदतर और खौफनाक हो जाती थी। राजपूत वीरांगनाएं यह बात अच्छी तरह जानती थीं।
उनके लिए धधकती आग में जल जाना, उस अंतहीन रोज-रोज के बला-त्कार और नरक जैसी गुलामी से हजार गुना बेहतर और सम्मानजनक था
जब महिलाएं जौहर की आग में कूदती थीं, कोई बेबसी या आत्महत्या नहीं थी, बल्कि अपने स्वाभिमान को दुश्मनों के पैरों तले कुचले जाने से बचाने के लिए जंग थी।
उनके इसी त्याग को देखकर राजपूत सैनिक सिर पर कफन बांधकर शाका यानी दुश्मन का खात्मा करने रणभूमि में कूदते थे।
तुम क्या जानो उस दौर की विभीषिका, उस दौर का दर्द और वो खौफनाक मंजर…
और इसके लिए मध्यकालीन युग में भी जाने की जरूरत नहीं भारत के विभाजन का वो दौर याद करो जब ना जाने कितने हिंदू और सिख परिवारों ने अपनी बेटियों की इज़्ज़त की रक्षा के लिए उन्हें जह-र दे दिया था..
बड़े बड़े इवेंट में बैठकर, हाथ में माइक लेकर और 21वीं सदी के फेमिनिज्म का चश्मा पहनकर मध्यकाल के उस खौफनाक मंजर पर छी कहना बहुत आसान है..
पर जब सामने हजारों की वो क्रूर और वहशी सेना खड़ी हो जिसके इरादे सिर्फ जमीन जीतना नहीं बल्कि औरतों के जिस्म को नोचना भी हो, तब धधकती आग के कुंड में मुस्कुराते हुए कूद जाना कायरता नहीं होती।
वह आत्मसम्मान और वीरता की वो सर्वोच्च पराकाष्ठा है जिसे समझने के लिए कलेजा चाहिए।
इतिहास को उसकी परिस्थितियों के हिसाब से देखा जाता है, अपनी आधुनिक सहूलियत और सस्ती राजनीति के चश्मे से नहीं..
काश तुम्हे बताया गया होता बचपन से कि छी कहाँ कहा जाता है..
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