और दिग्वी मर गया…

राजनांदगाँव के प्रतिष्ठित समाचार पत्र सबेरा संकेत के संस्थापक संपादक श्रद्धेय बाबूजी स्वर्गीय शरद कोठारी जी ने अपने समाचार पत्र में धारावाहिक कथा लिखी थी, “और दिग्वी मर गया।” बाद में इस धारावाहिक कथा को उन्होंने किताब के रूप में प्रकाशित कराया था। बाबूजी के निधन के बाद उनके सुपुत्र शैलेन्द्र कोठारी जी ने “और दिग्वी मर गया…” का पुन: प्रकाशन कराया था।

अभी जब मैंने हमारे दिवंगत राजा साहब के नाम से अपनी नई वेबसाइट बनवाई है, मेरे मन में आया कि साल 1960 के दशक में बाबूजी द्वारा लिखी गई धारावाहिक कथा “और दिग्वी मर गया…” को एक बार फिर पाठकों के समक्ष रखना चाहिये। यह धारावाहिक कथा बीते दौर के लोगों के साथ ही नए पाठकों के लिये भी पठनीय होगी।

मैंने इसके लिए शैलेन्द्र कोठारी जी से बात की और उन्होंने मुझे इजाजत दे दी कि मैं बाबूजी स्वर्गीय शरद कोठारी जी की इस महत्वपूर्ण लेखन को फिर से पाठकों के समक्ष रख दूं। आज बाबूजी की किताब के पुन:प्रकाशन के दौरान उनके सुपुत्र शैलेन्द्र कोठारी जी ने जो लिखा था, वह प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसके बाद अगले सोमवार को अपनी किताब के प्रकाशन के दौरान बाबूजी ने जो लिखा था, वह प्रस्तुत होगा। और इसके बाद “और दिग्वी मर गया…” धारावाहिक कथा की किश्तें हर सोमवार को पढ़ने मिलेंगी।

शैलेन्द्र कोठारी

पुनरावलोकन…

वे कोई खोजी पत्रकार नहीं थे, न सनसनीखेज कथाकार थे। वे एक सामान्य पत्रकार थे, जन साधारण की समझ के अनुसार भाषा में अपना साहित्य लेखन किया तथा आजीवन पत्रकारिता का दायित्व निभाया।

स्व. शरद जी कोठारी ने आज के दैनिक सबेरा संकेत के साप्ताहिक आवृत्ति काल में दो स्व-लिखित धारावाहिक कथाओं का प्रकाशन किया। उन्होंने प्रथम प्रयास तत्कालीन राजनांदगाँव रियासत के लोकप्रिय राजा महंत दिग्विजय दास की असामयिक मृत्यु पर रहस्य का पर्दा उठाने की कोशिश के रूप में “और दिग्वी मर गया” शीर्षक से तथा दूसरी धारावाहिक राजनीति में ऊंची छलांग के लिए जोड़-तोड़, सौदेबाजी के कृत्यों पर “दास्तान दो जम्हूरों की” शीर्षक से प्रकाशित किया था। दोनों धारावाहिक कथाओं के प्रकाशन काल में पाठकों को अगले किस्से की प्रतीक्षा रहा करती थी। वर्ष 1968-70 के मध्य प्रति सप्ताह की कडी़ सम्पन्न होने के बाद दोनों कथाओं को पुस्तकाकार में प्रस्तुत किया गया था। अब कई वर्षों के बाद “और दिग्वी मर गया” की संक्षिप्त प्रतियां मेरे कुछ मित्रों की जिज्ञासा के कारण प्रस्तुत है।

प्रस्तुत कथा में स्व. राजा साहब की रहस्यमय मृत्यु की परत-दर-परत रहस्य के आवरण को हटाने के साथ ही व्यंग्य की अनुपम बानगी ने कथा को रोचक बनाया है। बाबूजी स्व. शरद जी कोठारी की लेखनी की यही विशेषता रही कि व्यंग्य का पुट उनके पूरे लेखन में देखा जा सकता है।

वर्तमान दैनिक सबेरा संकेत में भी नगर की समस्याओं को “नगर दर्पण” स्तंभ में प्रति सोमवार को लिखते रहे, जिसे भी जन सामान्य के अनुकूल व व्यंग्य की भाषा के कारण हमारे पाठकों से अच्छा प्रतिसाद मिलता रहा। “नगर दर्पण” के धारावाहिक लेखन के संकलित अंश पुस्तकाकार के रूप में “विसंगतियों के रंग रूप” नाम से प्रस्तुत किया जा चुका है।

मूल प्रकाशन के आज 50 वर्षों के बाद “और दिग्वी मर गया” के पुनरावलोकन के पीछे उद्देश्य यह है कि नई पीढी़ को तत्कालीन रियासत के अतीत की झलक मिल सके। यद्यपि राजा साहब का कोई वारिस नहीं है, उनका वंश ही समाप्त हो गया।

शुभकामनाओं सहित…

जनवरी, 2018