
या जारी रहेगा सूखा?
जितेंद्र जैन जीतू
राजनांदगांव/खुज्जी। छत्तीसगढ़ के गठन के बाद से ही राजनांदगांव जिले की खुज्जी विधानसभा सीट राज्य की सबसे दिलचस्प और चर्चित सीटों में शुमार रही है। कभी भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली यह सीट पिछले दो दशकों से पार्टी के लिए एक सियासी पहेली बनी हुई है। पूर्व मंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता स्व. रजिंदरपाल सिंह भाटिया के बाद से इस सीट पर कमल खिलाने के लिए भाजपा तरस गई है। अब जबकि राजनीतिक गलियारों में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और भाजपा नेता एम.डी. ठाकुर की सक्रियता और केबिनेट मंत्री के दर्जे को लेकर सुगबुगाहट तेज है, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या खुज्जी का यह सियासी समीकरण भाजपा के पक्ष में करवट लेगा या इतिहास खुद को दोहराएगा।
वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद खुज्जी विधानसभा क्षेत्र के चुनावी परिणामों पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि यह सीट भाजपा के हाथ से कैसे फिसलती चली गई।
छत्तीसगढ़ बनने के तुरंत बाद हुए पहले चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री स्व. रजिंदरपाल सिंह भाटिया ने यहां से शानदार जीत दर्ज की थी और पार्टी का परचम लहराया था।
स्व. भाटिया को पार्टी द्वारा आगामी चुनाव में प्रत्याशी नहीं बनाए जाने के बाद से समीकरण पूरी तरह बदल गए। वर्ष 2008 के चुनाव में कांग्रेस के भोलाराम साहू ने जीत दर्ज की और भाजपा की ओर से मैदान में उतरीं स्व. जमुना देवी ठाकुर (एम.डी. ठाकुर की पत्नी) को हार का सामना करना पड़ा।
इस चुनाव में कांग्रेस के भोलाराम साहू ने फिर बाजी मारी। खास बात यह रही कि इस बार भी टिकट न मिलने पर वो निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे इस दौरान स्व. रजिंदरपाल सिंह भाटिया ने जबरदस्त सेंधमारी करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया, जबकि आधिकारिक भाजपा प्रत्याशी विजय दुखु राम साहू तीसरे स्थान पर खिसक गए।
कांग्रेस की लहर और प्रत्याशी छन्नी चंदू साहू की जीत ने भाजपा को यहाँ फिर पटकनी दी। इसी चुनाव में जोगी कांग्रेस (JCCJ) के प्रत्याशी की जमानत जब्त हुई थी।
इस बार भी कांग्रेस के भोलाराम साहू ने भाजपा प्रत्याशी गीता घासी साहू को परास्त कर खुज्जी पर कांग्रेस का परचम मजबूती से बरकरार रखा।
स्पष्ट है कि सन 2003 के बाद से भाजपा यहां एक भी विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब नहीं हो पाई है।
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एम.डी. ठाकुर लगातार खुज्जी क्षेत्र में सक्रिय रहकर जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। उनकी राजनीतिक महत्ता को देखते हुए पार्टी ने उन्हें अनुसूचित जनजाति आयोग का उपाध्यक्ष बनाते हुए राज्य मंत्री का दर्जा भी प्रदान किया है। इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद से सियासी गलियारों में यह कयास तेजी से लगाए जा रहे हैं कि क्या आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से एम.डी. ठाकुर ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार होंगे!?
इस बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी भले ही उन्हें आगे लाकर इस बार चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं: जिनमें अहम सवाल, क्या खुज्जी के मतदाता, जो लंबे समय से बदलाव या स्थानीय समीकरणों के आधार पर मतदान करते आए हैं, इस बार एम.डी. ठाकुर को अपनी पसंद बनाएंगे?
चूंकि उनकी पत्नी स्व. जमुना देवी ठाकुर भी पूर्व में यहां से चुनाव हार चुकी हैं, ऐसे में मतदाताओं के मन में परिवारवाद या पूर्व के परिणामों का कितना मनोवैज्ञानिक प्रभाव रहेगा?
मौजूदा समय में छत्तीसगढ़ के राजनीतिक पटल पर आम मतदाताओं के बीच शासन-प्रशासन के खिलाफ या स्थानीय मुद्दों को लेकर बदलाव की सुगबुगाहट समय-समय पर देखने को मिलती है। यदि खुज्जी क्षेत्र के मिजाज को टटोला जाए, तो यह सीट अमूमन स्थानीय जातीय समीकरणों (विशेषकर साहू बहुल प्रभाव) और क्षेत्रीय मुद्दों पर तय होती रही है।
यदि भाजपा एक बार फिर एम.डी. ठाकुर पर दांव लगाती है और प्रदेशव्यापी बदलाव की लहर के बीच पार्टी स्थानीय विरोध या एंटी-इम्बेंसी को साधने में नाकाम रहती है, तो पार्टी को एक बार फिर यहां निराशा हाथ लग सकती है। ऐसे में, एक बड़े प्रशासनिक पद और राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त कर चुके एम.डी. ठाकुर का राजनीतिक भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे पार्टी के भीतर के विरोध को थामकर कितनी मजबूती से चुनावी मैदान में उतरते हैं।
फिलहाल, खुज्जी का यह सियासी रणक्षेत्र राजनीतिक दलों के लिए अग्निपरीक्षा बना हुआ है, और यहां की जनता किसे अपना सिरमौर बनाएगी, इसका असली उत्तर तो आने वाला वक्त ही देगा।

