
बुराईयों को दूर करने शुरू हुआ था चलन
शरद कोकास, दुर्ग
||एक ऐसा पर्व जिसका उल्लेख किसी धार्मिक ग्रन्थ में नहीं है ||
मित्रों , महाराष्ट और खासकर विदर्भ के इलाके में बैलों के त्यौहार “पोला” के अगले दिन एक ऐसा पर्व मनाया जाता ही जिसके बारे में आपने कभी सुना नहीं होगा | चलिए आपको अपने बचपन की बात बताता हूँ |
पोला त्यौहार यानी अमावस्या के दिन बच्चे आसपास लगी बेशरम की झाड़ियाँ, कटीले पौधे, या खेतों में उगी खरपतवार उखाड़ कर लाते और उन्हें लोगों के घरों के दरवाज़े पर रख देते ৷
घर के लोग अपने बगीचों में लगी झाड़ियाँ भी उनमे शामिल कर देते৷ फिर अगले दिन सुबह वही बच्चे आते और उन झाड़ियों को उठाकार एक जुलूस के रूप में स्टेशन जानेवाली रोड पर पारस मेटल वर्क्स के आगे एक नाले तक जाते और सारी झाड़ियाँ वहाँ फेंककर आ जाते ৷ रास्ते भर वे नारे लगाते रहते

“कचरा काड़ी, रोग राई, ढेकूण, मुंगस, मच्छर, घेउन जा गे मारबत “ इसका अर्थ होता है “ हे मारबत, तू अपने साथ कचरा, गन्दगी, बीमारी, खटमल, मच्छर सब कुछ लेकर चली जा सीधे सीधे कहें तो दफ़ा हो जा ৷
बरसात के बाद होने वाली गन्दगी को साफ़ करने और हायजीन का सन्देश देता हुआ मारबत का यह शगूफा दुनिया में केवल विदर्भ महाराष्ट्र में ही होता है और इसमें कहीं कोई धार्मिक दखल नहीं है यह पूरी तरह से सामाजिक पर्व है ৷ ऐसा संभवतः किसानों द्वारा बुआई आदि के बाद खेतों से खरपतवार साफ़ करने , घरों व खेतों का कचरा दूर ले जाकर जलाने और सब कुछ साफ सुथरा करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया होगा जिसने आगे चलकर ‘मारबत’ का रूप ले लिया ৷
विदर्भ के विभिन्न स्थानों में निकाले जाने वाले मार्बत के इन जुलूसों में नागपुर की मारबत का जुलूस तो इतनी प्रसिद्ध है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ৷ हेल्थ हायजीन को लेकर साफ सफाई की यह परम्परा किसी सरकारी स्वच्छता अभियान से सैकड़ों साल पहले से चली आ रही थी लेकिन भोंसले काल में अर्थात सन अठारह सौ इक्यासी में इसमें एक अध्याय और जुड़ गया ৷ हुआ यह कि भोंसले घराने की एक स्त्री बकाबाई तत्कालीन अंग्रेज शासकों से मिल गई और उसने कुछ रहस्य उन्हें बता दिए ৷ मना जाता है कि इसके फलस्वरूप कालांतर में भोसले घराने का पतन हो गया ৷
अब अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव और साम्राज्यवादी लिप्सा के कारण भले भोंसले शासन का पतन हुआ हो लेकिन इलज़ाम बेचारी बकाबाई पर आ गया ৷ लोगों ने बकाबाई की एक प्रतिमा बनाई और उसे शहर की सीमा से बाहर ले जाकर जला दिया ৷ उसके बाद हर साल पोला त्यौहार के दूसरे दिन मारबत का विसर्जन करते समय उसमे बकाबाई की प्रतिमा जुड़ गई और लोगों ने उसे ‘काली मारबत’ नाम दे दिया ৷ उसीके साथ सन अठारह सौ पच्यासी से ‘पीली मारबत’ निकालने की परम्परा भी शुरू हुई ৷
बस उसके बाद से काली और पीली मारबत की प्रतिमाएँ बनाकर उनका जुलूस निकालने और अंत में उन्हें विसर्जित करने की यह परम्परा जो नागपुर में प्रारंभ हुई वह अब तक चल रही है कुछ साल बाद इसमें बड़ग्या की प्रतिमा भी जुड़ गई ৷
आप सोच रहे होंगे यह ‘बड़ग्या’ क्या है ৷ वैसे तो कहा जाता है की ‘बड़ग्या’ बकाबाई के पति का प्रतीक है ৷लोगों ने सोचा कि भोंसले शासन के पतन का दोष आखिर एक स्त्री को ही क्यों दिया जाए, इस षड्यंत्र में उसका पति भी तो बराबर का हिस्सेदार था ৷ इसलिए उसका पुतला बनाकर भी जुलुस निकलने की यह परंपरा प्रारंभ हुइ और उसे ‘बड़ग्या’ नाम दिया गया ৷ आगे चलकर जब लोगों को इस मारबत पर्व में आनंद आने लगा तो उन्होंने नए नए बडगे निकलने शुरू किये जिसमे भ्रष्टाचार का बडगा, घूसखोरी का बडगा, बेईमानी का बड़गा, दुश्मनी का बड़गा जैसे बडगे के पुतले फेमस हो गए ৷ और अब तो कोरोना वायरस का बड़गा भी इसमें शामिल हो गया है ৷ और जिस नेता को हटाना हो उसका पुतला भी बना देते हैं |
इस तरह मारबत का यह त्यौहार जो एक सामाजिक त्यौहार है चल निकला ৷ बडगा और काली पीली मारबत बनाने वाले ढेर सारे कलाकार आज नागपुर में उपस्थित हैं, जिनमे अठारह सौ पच्यासी में पीली मारबत के पुतले का निर्माण करने वाले स्व गणपत राव शेंडे के पुत्र भीमाजी, उनके पुत्र गजानन शेंडे और उनके परिवार के लोग शामिल हैं ৷ वहीं सदाशिव वस्ताद तकितकर की कई पीढियां जिनमे जयवंत मणिराम तकितकर और उनके घर के कलाकार आज भी सक्रिय हैं ৷ अब तो पीली मारबत की बेटी तरुण पीली मारबत का पुतला भी बनाया जाने लगा है ৷
कभी आप सावन की समाप्ति या अगस्त के माह में नागपुर जाएँ तो मार्बत का यह जुलूस देखना न भूलें ৷ और साथ में जोर से चिल्लाएँ घूसखोरी, भ्रष्टाचार करने वालों को, वादाखिलाफ़ी करने वालों को, झूठ बोलने वालों को,बेईमानी करने वालों को , वैमनस्यता, नफ़रत फ़ैलाने वालों को घेऊन जा गे मारबत ৷ वैसे प्रजातंत्र में आप यह काम अन्य माध्यमों से भी कर सकते हैं ৷

शरद कोकास की पुस्तक बैतूल से भंडारा में आप ऐसे ही अनेक किस्से और पढ़ सकते हैं |


