
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
ए.के. हंगल यानी अवतार किशन हंगल बॉलीवुड के इतिहास के एक ऐसे अनमोल रत्न थे, जिनकी असल जिंदगी फिल्मों से भी कहीं ज्यादा ड्रामेटिक और संघर्षपूर्ण थी। जब वे फ़िल्मों में आए तो उन्हें टैग दिया गया “ जन्म से बूढ़े नज़र आने वाले एक्टर” क्योंकि ए.के. हंगल ने हिंदी सिनेमा में जब क़दम रखा और जितने भी समय तक काम किया, दर्शकों को हमेशा ऐसा लगा मानो वे पैदा ही बुजुर्ग हुए हों
उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत ही 52 वर्ष की उम्र में बासु भट्टाचार्य की फिल्म तीसरी कसम से की थी जो साल 1966 में आई थी।
फिल्म शोले में उनके द्वारा निभाया गया “इतना सन्नाटा क्यों है भाई” का किरदार आज भी अमर है।
फिल्मों में हमेशा सीधे-साधे और मजबूर बुजुर्ग का रोल निभाने वाले ए.के. हंगल साहब का जन्म 1914 को अखंड भारत के सियालकोट में हुआ था। उनके पिता और दादा अंग्रेज़ों के यहाँ नौकरी करते थे और वो ख़ुद जवानी के दिनों में वे पेशावर में दर्जी का काम करते थे, वे कपड़े सिलने में इतने माहिर थे कि उस दौर के बड़े-बड़े रईस उनसे कपड़े सिलवाते थे, लेकिन उनका दिल देश की आजादी के लिए धड़कता था। वे कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े थे और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।
साल 1931 में, जब हंगल साहब 15-16 साल के थे, तब शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई , तो पूरे देश में आक्रोश फैल गया था..
उस समय देश भर के लोगों ने ब्रिटिश वायसराय को भेजने के लिए एक दया याचिका तैयार की थी, ताकि भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को रुकवाया जा सके. तब हंगल साहब ने ने भी पूरे जोश के साथ उस दया याचिका पर अपने साइन किए थे..
लेकिन अंग्रेजों ने उस दया याचिका पर कोई ध्यान नहीं दिया और 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई.
हंगल साहब ने अपने एक पुराने इंटरव्यू में उस रात का आंखों देखा मंजर बयां करते हुए बताया था कि
“मुझे वह दिन आज भी साफ याद है जब भगत सिंह को फांसी दी गई थी. उस शाम पेशावर में पठानों की एक बहुत बड़ी शोक सभा बुलाई गई थी। वहां मौजूद सभी लोग भगत सिंह की शहादत पर बच्चों की तरह फूट-फूटकर रो रहे थे और रोते हुए उनके सम्मान में पश्तो भाषा में कविताएं पढ़ रहे थे। पूरा पेशावर सड़कों पर उतर आया था और चारों तरफ सिर्फ ‘भगत सिंह… भगत सिंह’ के नारे गूंज रहे थे।
इस घटना ने हंगल साहब के भीतर के राष्ट्रवाद को जगा दिया और वे अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में पूरी तरह कूद पड़े, हड़तालें करने लगे, ट्रेड यूनियन से जुड़े और वामपंथी विचारधारा को अपना लिया.
1947 में देश का बंटवारा हुआ, तो उनका परिवार कराची में ही रह गया। हंगल साहब कट्टर कम्युनिस्ट और भारत के समर्थक थे, जो पाकिस्तान की नई सरकार को बिल्कुल रास नहीं आया। कम्युनिस्ट आंदोलनों में भाग लेने और भारत का पक्ष लेने के कारण उन्हें देशद्रोही करार देकर कराची की जेल में बंद कर दिया गया।
उन्होंने पाकिस्तान की जेल में पूरे 3 साल गुजारे। जेल में उन्हें भयानक यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। साल 1950 में जब वे जेल से रिहा हुए, तो उन्हें पाकिस्तान से निकाल दिया गया।
जब हंगल साहब भारत आए, तो उनके पास जेब में सिर्फ 20 रुपये थे। मुंबई आकर उन्होंने गुजारे के लिए फिर से कपड़े सिलने की दुकान खोली। जल्द ही वे मुंबई के मशहूर दर्जी बन गए, यहाँ तक कि उन्होंने उस जमाने के दिग्गज अभिनेता बलराज साहनी के कपड़े भी सिले। साथ ही वे इप्टा थिएटर से जुड़कर नाटक करने लगे..
इसके बाद उन्हें अभिनय का शौक ऐसा परवान चढ़ा कि उन्होंने 52 साल की उम्र में फिल्म तीसरी कसम से बॉलीवुड में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने शोले, नमक हराम, शौकीन, बावर्ची और लगान जैसी 225 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया..
1993 में, हंगल साहब ने मुंबई में पाकिस्तानी दूतावास द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत की थी। तब शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे को हंगल साहब का वहां जाना बिल्कुल पसंद नहीं आया था और उन्होंने सार्वजनिक रूप से हंगल साहब को देश-द्रो-ही करार दिया और उनकी फिल्मों के बहिष्कार का आह्वान किया था। उनकी फिल्मों के पोस्टरों पर कालिख पोत दी गई और उनकी फिल्मों को सिनेमाघरों से हटा दिया गया।
इस विरोध के बाद कई निर्देशकों ने डर के मारे हंगल साहब को फिल्मों से बाहर कर दिया। फिल्मों से उनके सीन तक काट दिए गए। हालांकि, हंगल साहब ने इस बात के लिए कभी माफी नहीं मांगी, क्योंकि उनका मानना था कि वे एक आधिकारिक सांस्कृतिक आमंत्रण पर वहां गए..
हंगल साहब ने पूरी जिंदगी मर्यादा और सिद्धांतों के साथ जी, लेकिन उनका अंतिम समय बेहद तंगहाली और गरीबी में गुजरा। बुढ़ापे में इलाज और दवाओं के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।
साल 2006 में जब राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें पद्म भूषण से नवाजा, तब भी इस क्रांतिकारी के तेवर कम नहीं हुए।
राजनीतिक व्यवस्था, बॉलीवुड के दिखावे और बुढ़ापे की तंगहाली से परेशान होकर उन्होंने बेहद बेबाकी से कहा था कि
मुझे पद्म भूषण मिला… क्या करूँगा इसको मैं… चाटूँगा..?
जब 26 अगस्त 2012 को 98 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, तो बॉलीवुड का कोई बड़ा सुपरस्टार उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ। यह देखकर वहां मौजूद लोगों के मुंह से उनका वो फिल्मी डायलॉग निकल पड़ा…
“इतना सन्नाटा क्यों है भाई…”
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