… और इस तरह इतिहास रच दिया था चांदनी ने

आज जन्मदिन

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

यश चोपड़ा….

जब भी हम उनका नाम सुनते हैं, तो आंखों के सामने स्विट्जरलैंड की खूबसूरत वादियां, शिफॉन की साड़ियों में लहराती हीरोइनें और दिल को छू लेने वाला रोमांटिक संगीत आ जाता है। उन्हें दुनिया किंग of रोमांस कहती है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि सबको प्यार की परिभाषा सिखाने वाले यश चोपड़ा की जिंदगी में एक ऐसा वक्त भी था जब वो दिवालिया होने की कगार पर थे?

बात है 1980 के दशक की। यश चोपड़ा ने दीवार और कभी कभी जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देकर इंडस्ट्री में अपना बड़ा नाम बना लिया था।
लेकिन अचानक वक्त बदला और उनकी लगातार कई फिल्में जैसे सिलसिला, फासले, मशाल और विजय बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई थीं।
हालात इतने खराब हो गए थे कि यशराज फिल्म्स जैसी बड़ी कंपनी बंद होने की कगार पर आ गई थी। यश जी आर्थिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर थे।

इंडस्ट्री के लोगों ने मान लिया था कि यश चोपड़ा का दौर खत्म हो गया है, वे अब फिल्में नहीं बना पाएंगे।
ये बॉलीवुड में वो दौर था जब सिर्फ मारधाड़ और खून-खराबे वाली फिल्में चल रही थीं…

एक दिन यश चोपड़ा अपनी गाड़ी से जा रहे थे, उन्होंने देखा सड़कों पर सिर्फ़ एक्शन फ़िल्मों के पोस्टर्स लगे थे, तब उन्होंने एक आखिरी दांव खेलने का फैसला किया।
उन्होंने फ़ैसला किया कि इस एक्शन और मारधाड़ वाली फिल्मों के दौर में वो एक प्योर रोमांटिक फिल्म बनायेंगे।
और उस फ़िल्म का नाम रखेंगे चांदनी…

यश चोपड़ा ने इस फिल्म की कहानी सबसे पहले रेखा को ध्यान में रखकर लिखी थी, क्योंकि फिल्म सिलसिला में भी रेखा के किरदार का नाम चांदनी था। लेकिन रेखा ने उस वक्त इस रोल को करने से मना कर दिया और यश जी को सलाह दी कि वे इसके लिए श्रीदेवी को साइन करें। ये सलाह मास्टरस्ट्रोक साबित हुई।

चूंकि यश चोपड़ा की पिछली कुछ फिल्में लगातार फ्लॉप हुई थीं, इसलिए कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर इस फिल्म पर पैसा लगाने को तैयार नहीं था। सबने यश चोपड़ा से कहा कि मारधाड़ के इस दौर में इतनी सॉफ्ट, रोमांटिक और गानों से भरी फिल्म बनाना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
यहाँ तक कि फिल्म के मुख्य डिस्ट्रीब्यूटर ने आखिरी वक्त पर फिल्म छोड़ दी।
लेकिन यश जी अपनी जिद पर अड़े रहे और खुद बड़ा रिस्क उठाकर फिल्म की फंडिंग की।

यश चोपड़ा चाहते थे कि चांदनी का किरदार बिल्कुल सादा और मासूम दिखे। उन्होंने तय किया कि फिल्म में भारी-भरकम गहने या भड़कीला मेकअप नहीं करेंगी, बल्कि वे ज्यादातर सफेद रंग के कपड़ों शिफॉन साड़ियों में नजर आएंगी।
शुरुआत में श्रीदेवी इस साधारण लुक को लेकर थोड़ी घबरा रही थीं, क्योंकि उन्होंने पहले कभी ऐसा नहीं किया था। लेकिन यश जी ने उनसे कहा, “तुम बस अपने डायरेक्टर के विजन पर भरोसा रखो।”

फिल्म रिलीज होने के बाद चांदनी लुक पूरे देश में एक जबरदस्त फैशन ट्रेंड बन गया।

यश चोपड़ा ने म्यूजिक के लिए उस समय के रेगुलर फिल्मी संगीतकारों को छोड़कर, दो महान शास्त्रीय संगीतकारों संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा और बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया को संगीत देने के लिए राजी किया।

प्योर रोमांस बनाने के वादे के बावजूद, यश चोपड़ा रिलीज से ठीक पहले थोड़े इनसिक्योर हो गए थे। क्योंकि विनोद खन्ना उस समय अपनी एक्शन और एंग्री मैन वाली इमेज के लिए जाने जाते थे, और फ़िल्म में विनोद खन्ना का कोई एक्शन सीन नहीं था। इस बात पर एक बड़े डिस्ट्रीब्यूटर ने फिल्म भी छोड़ दी थी कि बिना एक्शन के विनोद खन्ना को लोग नहीं देखेंगे..

तब माहौल को देखते हुए उन्होंने फिल्म के क्लाइमेक्स के पास ऋषि कपूर और विनोद खन्ना के बीच एक छोटा सा फाइटिंग सीन जबरदस्ती डाल दिया।
और जब फिल्म के साउंड डिजाइनर ने ये देखा तो उन्होंने यश जी से कहा भी था,
“क्या आप पागल हो गए हैं? इतनी खूबसूरत रोमांटिक फिल्म में इस मारधाड़ की क्या जरूरत थी?”
हालांकि, दर्शकों ने उस सीन को नजरअंदाज कर फिल्म के रोमांस को ही गले लगाया।
इस फिल्म के लिए उन्होंने अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी।

जब 14 सितंबर 1989 को फिल्म रिलीज हुई, तो पहले हफ्ते में इसका रिस्पॉन्स बहुत ठंडा था।
लोग मानने लगे थे कि फिल्म पिट गई।
लेकिन दूसरे हफ्ते से लोगों की माउथ पब्लिसिटी के दम पर फिल्म ने ऐसी रफ्तार पकड़ी और इसने जो इतिहास रचा, वो हम सब जानते हैं।
फिल्म सुपरहिट रही, गानों ने रिकॉर्ड तोड़ दिए और यश चोपड़ा ने साबित कर दिया कि शेर भले ही कुछ समय के लिए शांत हो, पर उसका दौर कभी खत्म नहीं होता।

यश जी के बारे में एक और कमाल की बात थी और वो थी उनकी बेबाकी, वे कभी घुमा-फिराकर बात नहीं करते थे।
मनोज बाजपेयी ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था एक बार वे यश चोपड़ा से मिले और उन्होंने यश जी से अपने लिए किसी रोल के बारे में पूछा।

तब यश चोपड़ा ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था, मनोज, मैं तुम्हारे जैसे एक्टर्स गंभीर और मेथड एक्टिंग करने वाले के लिए फिल्में नहीं बनाता। मेरी फिल्में कमर्शियल और मसालेदार होती हैं, जिनमें शायद तुम फिट भी नहीं होना चाहोगे।

यश चोपड़ा पहले डायरेक्टर नहीं बनना चाहते थे। वे अपने बड़े भाई बी.आर. चोपड़ा की तरह पढ़ाई पूरी कर इंजीनियर बनना चाहते थे या फिर लाहौर में फिल्मों में एक्टिंग ट्राई करना चाहते थे। लेकिन जब वे मुंबई आए, तो बी.आर. चोपड़ा ने उन्हें अपना असिस्टेंट डायरेक्टर बना दिया और यहीं से उनका असली सफर शुरू हुआ।

यश चोपड़ा ने महज 27 साल की उम्र में साल 1959 में फिल्म धूल का फूल से अपने निर्देशन की शुरुआत की थी, जो अनैतिक संबंधों और समाज की सोच पर आधारित एक बहुत ही बोल्ड विषय पर थी और सुपरहिट रही थी।

यश चोपड़ा को स्विट्जरलैंड की वादियों से इतना लगाव था कि वहां की सरकार ने उनके सम्मान में इंटरलेकन शहर में एक ट्रेन का नाम यश चोपड़ा रख दिया था और वहां एक झील के किनारे उनका ब्रोंज का स्टेचू भी लगाया गया है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि पामेला चोपड़ा से शादी करने से पहले यश चोपड़ा मशहूर अभिनेत्री मुमताज के प्यार में थे और उनसे शादी करना चाहते थे। उनके बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा रिश्ता लेकर मुमताज के घर भी गए थे, लेकिन मुमताज के करियर के पीक पर होने की वजह से उनके घरवालों ने मना कर दिया।
बाद में जब यश चोपड़ा की मुलाकात पामेला से एक संगीत समारोह में हुई, तो पामेला की आवाज सुनकर यश चोपड़ा ने अपने परिवार से जाकर कहा था “घंटी बज गई!” और 1970 में दोनों ने शादी कर ली।

आज वे हमारे बीच नहीं हैं 2012 में उनका निधन हो गया था, लेकिन जब तक दुनिया में प्यार और संगीत रहेगा, यश चोपड़ा का नाम हमेशा जिंदा रहेगा।

यश चोपड़ा को जन्मदिन की शुभकामनाएँ

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