पांच दिन कार्य दिवस की मांग को लेकर तीन दिन बैंकों में रहेगी हड़ताल

रवीश कुमार, दिल्ली

बैंक कर्मचारी क्यों हड़ताल पर हैं, इस सवाल का जवाब एक बैंकर ने लिख कर भेजा है-

मैं एक बैंकर हूँ और मैं आपको अपने जीवन का वृतांत सुना रहा हूँ। आज एक बैंकर की ज़िंदगी ऐसी हो गई है कि मात्र एक दिन की छुट्टी लेने के लिए भी रीजनल मैनेजर (RM) के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है। अगर कोई फोन करके यह बताए कि “सर, मुझे आज एक दिन की छुट्टी चाहिए,” तो आगे से सवाल दाग दिया जाता है—”क्या तुम्हारे टारगेट पूरे हो गए जो छुट्टी चाहिए? क्या बहुत ज़रूरी काम है? क्यों जाना है?” इस तरह की तमाम बातें सुनने को मिलती हैं। हालांकि, बैंक में साल भर में लगभग 45 दिनों की छुट्टियाँ घोषित हैं, लेकिन एक-एक छुट्टी के लिए तरसना पड़ता है।

सुबह 8:00 बजे घर से निकलने वाला बैंकर रात को 8:00 या 9:00 बजे के बाद ही घर लौट पाता है, क्योंकि एनपीए (NPA – गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) को रोकने का भारी दबाव होता है। हर खाते की मंथली ईएमआई (EMI) होती है, और यदि वह 90 दिनों तक जमा न हो, तो खाता एनपीए हो जाता है। ऐसे में रीजनल ऑफिस से ब्रांच हेड पर दबाव आता है कि यह खाता आज किसी भी हाल में एनपीए नहीं होना चाहिए। पहले केवल महीने की आखिरी तारीख को एनपीए रोकने का दबाव होता था, लेकिन अब हर सिंगल डे (प्रतिदिन) यह प्रेशर रहता है।

रात के 9:00 बज रहे होते हैं और रीजनल ऑफिस से फोन आता है कि “किसी भी तरह इस खाते को बचाइए।” थक-हारकर जब ब्रांच हेड को लगता है कि उसे अब घर जाना चाहिए, तो वह अपनी जेब से 2,000, 4,000 या 10,000 रुपये तक की ईएमआई खुद भर देता है। बाद में ग्राहक वह पैसा लौटाता नहीं है, जिससे बैंक मैनेजर के अपने पैसे डूब जाते हैं।

बैंक में दिनभर कई तरह के मानसिक तनाव झेलने पड़ते हैं। आपको रिकवरी के लिए फील्ड में निकलना होता है। वहाँ कोई ग्राहक आपको ब्लैकमेल करता है कि “मेरे घर मत आओ, नहीं तो मैं पैसा जमा नहीं करूँगा, सिर्फ़ फोन पर बात करो।” फोन पर बात करने के दौरान ग्राहक कभी-कभी अभद्र और गाली-गलौज वाली भाषा का प्रयोग करते हैं। उस तनाव में यदि मैनेजर के मुँह से गलती से भी कोई गलत बात निकल गई, तो ग्राहक उसकी कॉल रिकॉर्डिंग करके ब्लैकमेल करने लगता है।

आज बैंकों में चपरासी (प्यून) और झाड़ू लगाने वाले (स्वीपर) की स्थायी बहाली नहीं होती। कई बार बैंक मैनेजर को खुद अपने हाथों से बैंक का ताला खोलना पड़ता है। यदि बैंक में स्वीपर को बाहर से रख भी लिया जाए, तो बैंक प्रबंधन कहता है कि ऐसा करना नियमों के खिलाफ है। कई शाखाएँ ऐसी हैं जहाँ सिर्फ़ तीन स्टाफ हैं और उन्हीं के भरोसे पूरी ब्रांच चलाई जा रही है; कहीं-कहीं तो सिर्फ़ दो ही स्टाफ होते हैं—एक शाखा प्रबंधक (ब्रांच मैनेजर) और एक कैशियर। अगर उनमें से किसी एक ने छुट्टी ले ली या कोई बीमार पड़ गया, तो बैंक चलाना असंभव हो जाता है। प्रशासनिक विभाग (HR) कोई अतिरिक्त स्टाफ मुहैया नहीं कराता, जिसके कारण बीमार होने पर भी बैंक मैनेजर को मजबूरन आकर काम करना पड़ता है।
इसके अलावा, पहले हमें साल में केवल एक बार 31 मार्च को अपने सालाना टारगेट पूरे करने होते थे। लेकिन अब मासिक (मंथली) टारगेट का सिस्टम आ गया है। आपको हर महीने लोन, डिपॉजिट और एनपीएस (NPS) के टारगेट पूरे करने ही हैं। रीजनल ऑफिस के अधिकारी दिनभर फोन करके प्रताड़ित करते हैं और कहते हैं—”आप लोग कोई काम नहीं करते, निकम्मे हो, किस बात की सैलरी लेते हो?” वे खुद को राजा और हमें चपरासी समझते हैं।

इसके बाद महीने में चार से पांच बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के ज़रिए मीटिंग्स होती हैं। इस वीसी में जिन मैनेजर्स के टारगेट पूरे नहीं होते, उन्हें कैमरे के सामने सबके सामने बुरी तरह डांटा और बेइज्जत किया जाता है।

पहले बैंक का काम सिर्फ़ पैसे जमा करना और लोन देना होता था। लेकिन आज बैंक में हर तरह की सरकारी योजनाओं की बाढ़ आ गई है—जैसे पीएमजीजेबीवाई (PMJJBY), पीएमएसबीवाई (PMSBY), मुद्रा योजना आदि। हर व्यक्ति को इन योजनाओं से जोड़ना पड़ता है।

इसके अलावा, आजकल ग्राहक तुरंत ऑनलाइन शिकायत (Online Complaint) करने लगे हैं। यदि शाखा में छोटी सी भी कोई समस्या हो जाए, तो वे सीधे ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा देते हैं। इसके बाद तुरंत रीजनल ऑफिस से फोन आ जाता है कि “इस ग्राहक ने शिकायत क्यों की? तुम खुद उसे फोन करके माफी मांगो और इस शिकायत को जल्द से जल्द बंद (क्लोज) करवाओ।”

आज का बैंकर बिल्कुल एक कठपुतली के समान हो गया है, जिसे जैसे नचाया जाए, वह वैसे ही नाचता है। बैंक में काम का दबाव तो पहले भी था, लेकिन आज जैसी मानसिक प्रताड़ना नहीं थी। आजकल एक छोटे से काम को करने की प्रक्रिया बहुत लंबी और जटिल हो गई है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी ग्राहक का खाता डॉर्मेंट (निष्क्रिय) हो गया है, तो उसे दोबारा चालू करने के लिए आरबीआई (RBI) के नियमानुसार री-केवाईसी (Re-KYC) और ई-केवाईसी (e-KYC) जैसी तमाम औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत समय लगता है। कभी-कभी बैंक का सर्वर या पोर्टल ठीक से काम नहीं करता, जिससे ग्राहकों को असुविधा होती है और बैंक का दूसरा काम भी पेंडिंग हो जाता है।

मान लीजिए कि काउंटर पर पैसे निकालने (पेमेंट) वालों की लंबी लाइन लगी है, और उसी बीच कोई अपना डॉर्मेंट खाता चालू करवाने आ गया, तो स्टाफ उसी केवाईसी की प्रक्रिया में उलझ जाता है। नतीजा यह होता है कि कैश काउंटर की भीड़ वैसी की वैसी खड़ी रह जाती है। चूंकि स्टाफ की भारी कमी है और बैंक में केवल तीन ही लोग हैं—एक कैश काउंटर पर बैठा है और एक मैनेजर है—ऐसे में यदि मैनेजर को रिकवरी या किसी काम से फील्ड में जाना पड़ जाए, तो पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है।

इस तरह से आज बैंकर्स को बुरी तरह टॉर्चर किया जा रहा है। बैंक में कर्मचारियों के आने का तो समय निश्चित है, लेकिन जाने का कोई समय तय नहीं है। इसके अलावा, एक बैंकर को दिन-रात तमाम तरह की मानसिक परेशानियों और भारी तनाव से गुजरना पड़ता है।

स्टाफ के 9:45 बजे पहुँचने का नियम है। लेकिन यदि कोई कर्मचारी 5 मिनट भी लेट पहुँचता है, तो उसे रीजनल ऑफिस के बैंकर्स ग्रुप में लिखना पड़ता है कि ‘मैं आज 5 मिनट लेट आ रहा हूँ।’ बैंक के रीजनल ऑफिस से फोन करके यह चेक किया जाता है कि लोग 9:45 बजे पहुँचे या नहीं। इस दबाव के कारण कभी-कभी बैंकर बहुत तेज गाड़ी चलाते हैं, जिससे उनका एक्सीडेंट हो जाता है और यहाँ तक कि उनकी जान भी चली जाती है।

आमतौर पर यह कहा जाता है कि बैंक कर्मचारी आराम से एक (एसी) कमरे में बैठे रहते हैं। लेकिन असलियत यह है कि जब आप कई शाखाओं (branches) में जाएँगे, तो वहाँ न तो एसी होता है, न कूलर और न ही वेंटिलेशन (हवा आने-जाने) की कोई सही व्यवस्था होती है। बैंक कर्मचारी दिनभर भीषण गर्मी में तपते रहते हैं और उन्हें इसी भारी दबाव और माहौल में काम करना पड़ता है। इसके अलावा, bank का एक सख्त ड्रेस कोड भी होता है, जिसके तहत आपको फॉर्मल जूते और फुल-स्लीव या फॉर्मल हाफ-स्लीव कपड़े ही पहनने होते हैं। इस गर्मी में तपने के साथ-साथ उन्हें फॉर्मल कपड़े भी पहनने पड़ते हैं, काम भी करना होता है और सामने कस्टमर (ग्राहकों) की लंबी लाइन भी लगी रहती है।इसके साथ ही, जो काम पहले कुछ ही मिनटों में हो जाता था, अब उसमें बहुत अधिक समय लगता है क्योंकि बैंकिंग प्रक्रियाएँ काफी बढ़ गई हैं।

उदाहरण के लिए, पहले जब हम ऑनलाइन खाता खोलते थे, तो वह महज 1 मिनट में खुल जाता था। लेकिन अब खाता खोलने के लिए पहले सारे दस्तावेजों (documents) को डीएमएस (DMS) में अपलोड करना पड़ता है, और उसके बाद ही खाता खुल पाता है। इस जटिल प्रक्रिया की वजह से काम का बोझ और बैंक में ग्राहकों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है। नतीजा यह होता है कि कस्टमर का काम समय पर नहीं हो पाता और इसका पूरा तनाव बैंकर्स को झेलना पड़ता है।इसके अलावा, बैंक कर्मचारियों को बैंकिंग के साथ-साथ कई बाहरी कामों में भी झोंक दिया जाता है। उदाहरण के लिए, कभी उन्हें इलेक्शन ड्यूटी (चुनाव कार्य) में लगा दिया जाता है, तो कभी किसी अन्य सरकारी योजना या काम में भेज दिया जाता है। काम का बोझ इतना अधिक होता है कि कई बैंकर्स को सैटरडे और संडे (शनिवार और रविवार) की छुट्टियों के दिन भी बैंक जाकर अपना पेंडिंग (बकाया) काम निपटाना पड़ता है, क्योंकि बैंक का पेंडिंग काम कभी खत्म ही नहीं होता।

बैंक के इस तरह के दमघोंटू और तनावपूर्ण वर्क कल्चर (कार्य संस्कृति) को झेलते हुए कर्मचारियों को बीपी, शुगर (मधुमेह) और तमाम तरह की गंभीर बीमारियाँ घेर लेती हैं। वे इसका सही से इलाज भी नहीं करवा पाते क्योंकि उन्हें हर हाल में रोज़ ड्यूटी तो जाना ही पड़ता है। छोटी-मोटी बीमारियों को बैंक प्रबंधक बहुत हल्के में लेते हैं और यह बोलकर टाल देते हैं कि ‘समस्या तो हर किसी को है, मुझे भी प्रॉब्लम है, मैं क्या करूँ?’इसके अतिरिक्त, ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी भारी भेदभाव देखने को मिलता है। कई ईमानदार कर्मचारियों को पूरी जिंदगी ग्रामीण शाखाओं (rural branches) में ही काटनी पड़ जाती है, और उनके घर के पास वाली शाखा में पोस्टिंग का कभी नंबर ही नहीं आता। वहीं दूसरी ओर, बहुत से चापलूस किस्म के लोग अपनी साठगांठ के दम पर पूरी नौकरी रीजनल ऑफिस, सेंट्रल ऑफिस या एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसों में ही बिता देते हैं। इस तरह जो फील्ड स्टाफ है, वह हमेशा फील्ड की मार झेलता रहता है। बैंक कर्मचारियों की ऐसी ही तमाम गंभीर समस्याएँ हैं।