मानव का भविष्य या भविष्य का मानव?

राजेश शर्मा, राजनांदगाँव

कभी इंसान ने पहिया बनाया था ताकि मेहनत कम हो। फिर मशीन बनाई ताकि हाथों का काम कम हो। कंप्यूटर बनाया ताकि दिमाग का हिसाब-किताब कम हो। और अब एआई बना लिया है ताकि शायद दिमाग लगाने की जरूरत ही न पड़े।
यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प और थोड़ी डरावनी हो जाती है।
आज एआई से कविता लिखवाई जा रही है, भाषण बनवाया जा रहा है, फोटो में जवानी लौटाई जा रही है और ऐसी-ऐसी सलाह ली जा रही है, जिसके लिए कभी इंसान अपने बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर राय लिया करता था। फर्क सिर्फ इतना है कि बुजुर्ग सलाह देने के बाद कहते थे- “सोच लेना।” एआई सलाह देकर कहता है- “अगर चाहें तो मैं इसे और बेहतर कर सकता हूँ।”
अब समस्या यह नहीं कि एआई कितना बुद्धिमान हो रहा है। असली समस्या यह है कि इंसान कितना आलसी होता जा रहा है।
कल तक विद्यार्थी निबंध लिखने के लिए किताब खोलता था। आज विषय लिखकर एआई से कहता है- “सरल भाषा में, 500 शब्दों में।” शिक्षक भी खुश, विद्यार्थी भी खुश और कॉपी भी इतनी सुंदर कि देखकर लगता है विद्यार्थी ने रातभर तपस्या की है।
कार्यालयों में भी स्थिति कम मनोरंजक नहीं है। पहले अधिकारी नोटशीट लिखते थे, बाबू उसका मसौदा बनाते थे और फिर कई बार संशोधन होता था। अब एआई से मसौदा तैयार होता है, अधिकारी उसे पढ़े बिना आगे बढ़ाते हैं और अंत में फाइल पर लिखा मिलता है-“आवश्यक कार्यवाही हेतु।”
आवश्यक कार्यवाही क्या है, यह अब शायद एआई को भी नहीं पता।
सबसे बड़ा खतरा एआई के बुद्धिमान होने से नहीं, बल्कि उसके गलत हाथों में पड़ने से है। झूठी तस्वीरें, नकली वीडियो, फर्जी आवाजें और ऐसी खबरें जिन्हें देखकर सच और झूठ में अंतर करना मुश्किल हो जाए। यह सब लोकतंत्र और समाज के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
आज किसी व्यक्ति की आवाज में वह बात कहलवाई जा सकती है, जो उसने कभी कही ही नहीं। किसी चेहरे पर ऐसा दृश्य चिपकाया जा सकता है, जिसमें वह कभी था ही नहीं। यानी भविष्य में अदालत में गवाह से ज्यादा भरोसा शायद यह साबित करने पर करना पड़े कि वीडियो असली है या एआई की कलाकारी।
और अगर एआई ने कभी यह तय कर लिया कि इंसानों की सबसे बड़ी समस्या स्वयं इंसान हैं, तब?
शायद वह हमारी बैठकों को देखकर निष्कर्ष निकाले- “इन लोगों को निर्णय लेने में इतना समय लगता है कि निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी मुझे ही ले लेनी चाहिए।”
फिर लोकतंत्र का क्या होगा?
चुनाव होंगे, भाषण होंगे, घोषणापत्र होंगे और संभव है कि उम्मीदवार भी इंसानों के बजाय एआई से भाषण लिखवाकर कहें- “मैं जनता के मन की बात समझता हूँ।”
उधर जनता भी एआई से पूछेगी- “किसे वोट दें?”
और एआई कहेगा- “आपकी पसंद के आधार पर तीन विकल्प उपलब्ध हैं।”
तब लोकतंत्र में जनता कहाँ बचेगी, यह शोध का विषय होगा।
हालांकि एआई को पूरी तरह खलनायक बना देना भी उचित नहीं है। चिकित्सा, शिक्षा, विज्ञान, कृषि, प्रशासन और अनेक क्षेत्रों में यह मानव जीवन को बेहतर बनाने की अपार क्षमता रखता है। समस्या तकनीक में कम और उसके उपयोग की नीयत में ज्यादा है।
चाकू से फल भी काटा जा सकता है और नुकसान भी किया जा सकता है। दोष चाकू का नहीं होता। एआई भी ऐसा ही है, यह मानवता का सबसे उपयोगी औजार बन सकता है और सबसे खतरनाक हथियार भी।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “क्या एआई मानवता को खत्म कर देगा?”
असली सवाल है-
“क्या मानवता अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना बंद कर देगी?”
क्योंकि जिस दिन इंसान ने हर सवाल का जवाब एआई से और हर निर्णय की जिम्मेदारी एआई पर डाल दी, उस दिन एआई को मानवता नष्ट करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। मानवता स्वयं ‘Accept’ का बटन दबाकर तमाम शर्तों से सहमत हो चुकी होगी।इस संबंध में आप क्या सोचते है दोस्तों कमेंट्स में जरूर बताएं?