​मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सियासी नौटंकी, डॉक्टरों की कमी और दवाओं के टोटे पर अधीक्षक का घेराव क्यों?


​नीतिगत फैसलों पर चुप्पी, स्थानीय विधायक डॉ. रमन सिंह के कैंप कार्यालय पर प्रदर्शन से क्यों बच रहे कांग्रेसी?
जितेंद्र जैन जीतू
​राजनांदगांव। स्व. अटल बिहारी बाजपेयी स्मृति शासकीय मेडिकल कॉलेज एवं संबद्ध अस्पताल की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जितेंद्र मुदलियार के नेतृत्व में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने अस्पताल परिसर में जमकर नारेबाजी की और अस्पताल अधीक्षक का घेराव कर ज्ञापन सौंपा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बाद शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और मरीजों के परिजनों के बीच यह सवाल जोर-शोर से उठने लगा है कि क्या अस्पताल अधीक्षक के पास डॉक्टरों की भर्ती करने या शासन स्तर से दवाओं का बजट पास कराने की शक्ति है? जब नीतिगत फैसले शासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के स्तर पर होने हैं, तो फिर कांग्रेस नेता स्थानीय विधायक और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के कैंप कार्यालय का घेराव करने से परहेज क्यों कर रहे हैं?

​घेराव के दौरान कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि अस्पताल को ‘रेफर सेंटर’ बना दिया गया है, शाम होते ही प्राइवेट अस्पतालों के दलाल सक्रिय हो जाते हैं और मरीजों को निजी अस्पतालों में भेज दिया जाता है। इस दौरान 50 फीसदी से कम स्टाफ और डॉक्टरों की भारी कमी का मसला भी उठाया गया।
​परंतु जमीनी हकीकत यह है कि किसी भी शासकीय मेडिकल कॉलेज का अस्पताल अधीक्षक एक प्रशासनिक व चिकित्सकीय पद होता है, जो सीमित संसाधनों और शासन से मिले बजट के भीतर दैनिक व्यवस्थाओं का संचालन करता है।
​डॉक्टरों व स्टाफ की नियुक्ति नियमित डॉक्टरों की भर्ती लोक सेवा आयोग (CGPSC) या राज्य शासन स्तर से स्वीकृत पदों के आधार पर होती है। यह अधिकार अस्पताल अधीक्षक के दायरे में नहीं आता।
उसी तरह ​दवाओं और उपकरणों का आबंटन सीजीएमएससी (CGMSC) और स्वास्थ्य विभाग के बजट पर निर्भर रहता है। एमआरआई मशीन की स्थापना, ट्रॉमा सेंटर की स्वीकृति और टेंडर प्रक्रिया पूरी तरह मंत्रालय और शासन के अधिकार क्षेत्र का विषय है।
​अधीक्षक स्वयं यह स्वीकार कर रहे हैं कि अस्पताल आधे से कम (50% डेफिसिट) स्टाफ के साथ जूझ रहा है और वे शासन व प्रशासन को लगातार पत्राचार कर रहे हैं। ऐसे में असहाय अधीक्षक की घेराबंदी कर केवल फोटो खिंचवाना समस्याओं का समाधान है या महज सियासी खानापूर्ति?
इस मामले में जनता का ​बड़ा सवाल डॉ. रमन सिंह के कैंप कार्यालय के सामने धरना प्रदर्शन क्यों नहीं?
​राजनांदगांव विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कोई साधारण विधायक नहीं, बल्कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह कर रहे हैं। जिले के सांसद भी सत्ताधारी दल भाजपा के ही हैं।
​यदि राजनांदगांव के सबसे बड़े अस्पताल में 50 फीसदी डॉक्टर नहीं हैं, जीवनरक्षक दवाइयों का टोटा है, और गर्भवती महिलाओं के वार्डों तक में बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, तो इसके लिए राज्य की सत्ता और स्थानीय प्रभावशाली जनप्रतिनिधि सीधे तौर पर जवाबदेह हैं। शहर की जनता अब खुलकर यह पूछ रही है कि ​कैंप कार्यालय पर प्रदर्शन क्यों नहीं?
राजनांदगांव में डॉ. रमन सिंह का कैंप कार्यालय मौजूद और उनका आना जाना भी निरंतर लगा रहता है। कांग्रेस नेता शासन स्तर के इन नीतिगत मुद्दों, डॉक्टरों के रिक्त पदों और बजट की मांगों को लेकर सीधे प्रदेश के कद्दावर नेता तीन बार के मुख्यमंत्री और वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष राजनादगांव के विधायक के कैंप कार्यालय पर धरना क्यों नहीं देते?
इस मामले में जनता जनार्दन पूछ रही है ​सख्त टकराव से परहेज क्यों? क्या कांग्रेस नेताओं की यह आक्रामकता केवल एक सरकारी अधिकारी (अधीक्षक) तक ही सीमित है? सत्ता के शीर्ष पर बैठे जनप्रतिनिधियों के सामने जाकर दो-टूक सवाल करने का साहस स्थानीय विपक्ष क्यों नहीं जुटा पा रहा?
​ज्ञापन की रस्म अदायगी 15 दिन का अल्टीमेटम देकर अस्पताल के अधिकारियों के दफ्तर का पंखा-एसी बंद करवा देना सुर्खियां तो बटोर सकता है, लेकिन जब तक शासन स्तर पर बजट और पदों की मंजूरी के लिए दबाव नहीं बनेगा, तब तक आम मरीज को राहत कैसे मिलेगी?
​राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज जिले सहित बस्तर और सीमावर्ती महाराष्ट्र तक के गरीब मरीजों की जीवनरेखा है। अस्पताल की अव्यवस्थाएं, दलालों का जाल और सुविधाओं का अभाव निसंदेह चिंताजनक है। लेकिन इसका स्थायी समाधान अधीक्षक के चेंबर में नारेबाजी करने से नहीं, बल्कि रायपुर मंत्रालय और स्थानीय विधायक के कैंप कार्यालय पर ठोस नीतिगत मांगें रखकर ही संभव है। जब तक विपक्षी दल सही जगह पर दबाव नहीं बनाएगा, तब तक अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ऐसे ही सियासी दांव-पेंच के बीच पिसती रहेंगी।