
आज जन्मदिन
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
हर साल जब कैलेंडर पर 8 सितंबर की तारीख आती है, तो संगीत प्रेमियों के दिलों से एक ही आवाज़ निकलती है…जन्मदिन मुबारक हो, आशा जी ❤️
हालांकि, अप्रैल 2026 में आशा जी इस दुनिया को अलविदा कह गईं, लेकिन उनकी जादुई आवाज और जिंदादिली आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही ताज़ा है।
उनकी जिंदगी भी एक फ़िल्म की तरह रही है जिसमें संघर्ष भी है , खूबसूरत मोहब्बत भी है और उसमें बजता संगीत भी है..
आशा ताई जब 16 साल की थी तब उन्होंने अपने परिवार के खिलाफ जाकर अपनी से दुगनी उम्र के शख्स से शादी कर ली, लेकिन ये रिश्ता सिवाय दर्द और अकेलापन के अलावा उन्हें कुछ ना दे सका। डोमेस्टिक वायलेंस का शिकार हुई और आख़िरकार अपना घर छोड़ना पड़ा..
जब वे वापस सिंगिंग की दुनिया में लौटीं, तो उनके सामने बड़ी बहन लता मंगेशकर जी की कामयाबी का एक ऐसा बड़ा मुकाम था, जिसकी परछाई से निकलना आसान नहीं था।
शुरुआत में आशा जी को वही गाने मिलते थे जिन्हें लता जी या अन्य बड़ी गायिकाएं मना कर देती थीं। लोग उनसे कहते थे कि वे लता जी की तरह गाएं।
ठीक इसी मोड़ पर 1950 के दशक में उनकी जिंदगी में आए दिग्गज संगीतकार ओ.पी. नैयर साहब। नैयर साहब ने ही पहली बार पहचाना कि आशा की आवाज में एक अलग ही स्पार्क है। उन्होंने आशा जी से कहा,
“तुम्हें किसी की नकल करने की जरूरत नहीं है।”
नैयर साहब ने आशा जी की आवाज में छिपे वेस्टर्न टच और अल्हड़पन को तराशा..
दोनों का यह साथ करीब 14-15 साल तक चला। इस दौर में उन्होंने उड़े जब जब जुल्फें तेरी, आइये मेहरबां और आओ हुज़ूर तुमको जैसे एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने दिए।
ओ.पी. नैयर साहब के संगीत और उनके साथ के रिश्ते ने आशा जी को फिल्म इंडस्ट्री में एक स्वतंत्र रॉकस्टार के रूप में स्थापित कर दिया।
लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था, और 1970 के दशक की शुरुआत में एक कड़वाहट के साथ दोनों के रास्ते हमेशा के लिए अलग हो गए..
ओ.पी. नैयर साहब से अलग होने के बाद आशा जी के जीवन में एक नया और सबसे खूबसूरत अध्याय शुरू हुआ..राहुल देव बर्मन यानी पंचम दा का।
दोनों की पहली मुलाकात तब हुई थी जब पंचम दा स्कूल में पढ़ते थे और आशा जी संगीतकार सचिन देव बर्मन यानी पंचम दा के पिता के साथ गाने रिकॉर्ड करती थीं।
शुरुआत में दोनों के बीच केवल एक संगीतकार और गायिका का रिश्ता था। दोनों ने अपने-अपने जीवन में पहले अलग शादियां की थीं आशा जी ने गणपतराव भोसले से और पंचम दा ने रीता पटेल से…
लेकिन सालों बाद जब दोनों मिले तो जिंदगी के मोड़ों पर अकेले खड़े थे।
जब इन दो फनकारों का मेल स्टूडियो में हुआ, तो बॉलीवुड में धुनों का एक नया पागलपन शुरू हुआ।
पंचम दा अजीबोगरीब चीजों से धुन बनाते थे, कभी चम्मच को कांच के गिलासों से टकराकर जैसा उन्होंने चुरा लिया है तुमने गाने में किया था तो कभी सिगरेट की डिब्बी को रगड़कर। आशा जी उनकी हर सनक को हंसकर गा लेती थीं और उस गाने को अमर बना देती थीं…
फिर चाहे चुरा लिया है तुमने…की मखमली खनक हो या फिर तेज बुखार में गाया गया पिया तू अब तो आजा…इस जोड़ी ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया था।
आशा जी के साथ काम करते-करते पंचम दा उनके हुनर के साथ-साथ उनकी सादगी के भी दीवाने हो गए।
वे आशा जी से उम्र में छह साल छोटे थे, लेकिन उनके दिल में आशा जी के लिए बेहद गहरा सम्मान और प्यार था।
पंचम दा ने आशा जी को प्रपोज करने के लिए सालों तक उनका पीछा किया। वे अक्सर उनके लिए फूल और तोहफे भेजते थे।
एक दिन पंचम दा ने आशा जी को प्रपोज करने का एक अनोखा तरीका निकाला। वे आशा जी के पास गए और बिना कुछ बोले उनके हाथ में एक पीला गुलाब थमा दिया।
लेकिन उनकी शादी की राह बिल्कुल आसान नहीं थी। दोनों के लिए यह दूसरी शादी थी और समाज के साथ-साथ उनके अपने परिवार में भी इसका भारी विरोध था।
पंचम दा की माँ मीरा देव बर्मन इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थीं। उन्होंने साफ़ कह दिया था कि अगर आशा से शादी करनी है तो मेरी ला-श के ऊपर से गुज़रना होगा..
उनकी नाराज़गी की दो बड़ी वजहें थीं-
पहली यह कि आशा जी उम्र में पंचम दा से 6 साल बड़ी थीं, और दूसरी कि वे तीन बच्चों की माँ थीं।
उस दौर के समाज में इस रिश्ते को स्वीकार करना मुश्किल था।
अपनी पहली शादी के कड़वे अनुभवों और घरेलू हिंसा को झेल चुकीं आशा जी भी दोबारा किसी बंधन में बंधने से कतरा रही थीं।
लेकिन पंचम दा की बेपनाह मोहब्बत, उनकी ज़िद और आशा जी के बच्चों को अपनाने की इच्छा ने आखिरकार सारे डर दूर कर दिए। माँ की बीमारी और पारिवारिक तनाव के बीच, साल 1980 में दोनों ने निजी समारोह में शादी कर ली।
मगर वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। 1980 के दशक के आखिरी सालों में पंचम दा का दौर थोड़ा धीमा पड़ गया और उन्हें फिल्में मिलना कम हो गईं। वे अंदर से उदास रहने लगे थे।
इसी उदासी के बीच साल 1987 में फिल्म इजाज़त आई। गुलज़ार साहब ने इस फिल्म के लिए एक गाना लिखा
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है…”।
जब पंचम दा ने इसके बोल देखे, तो वे भड़क गए क्योंकि इसमें कोई पारंपरिक तुकबंदी नहीं थी। उन्होंने मजाक में गुलज़ार जी से कहा कि कल को तुम अखबार की कोई कतरन ले आओगे और कहोगे कि इस पर धुन बनाओ।
पंचम दा परेशान थे कि बिना लय की इन लाइनों को गाने में कैसे ढालें। तभी कमरे के कोने में बैठी आशा जी ने चुपके से उन लाइनों को अपने मन में गुनगुनाना शुरू किया।
उनकी दर्दभरी और मखमली गुनगुनाहट जैसे ही पंचम दा के कानों में पड़ी, उनके दिमाग में एक जादुई धुन कौंध गई।
जब आशा जी ने इस गाने को माइक पर रिकॉर्ड किया, तो उसमें पंचम दा का अकेलापन और दोनों के बीच का गहरा अहसास पूरी तरह घुल गया था। कहते हैं कि इस गाने को गाते समय आशा जी की आंखें नम थीं।
यह गाना जुदाई का सबसे खूबसूरत दस्तावेज बन गया, जिसके लिए आशा जी को नेशनल अवार्ड भी मिला था।
साल 1994 में पंचम दा अचानक दो दिल के दौरों के बाद इस दुनिया को छोड़ गए। इस खबर ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को हिला दिया, लेकिन आशा जी के लिए यह वज्रपात जैसा था।
वे इस कदर टूट गईं कि उन्होंने उस कमरे में जाने से ही इनकार कर दिया जहाँ पंचम दा का बेजान शरीर रखा था।
उन्होंने रोते हुए कहा, “मैं उस कमरे में नहीं जाऊंगी। मैं उसे मरा हुआ नहीं देख सकती, मैं उसे ज़िंदा देखना चाहती हूँ।”
उस मुश्किल वक्त में उनके करीबी दोस्त और पड़ोसी गुलज़ार साहब ने ही उन्हें संभाला था..उसके बाद दशकों तक आशा जी ने अकेले ही संगीत के सफर को आगे बढ़ाया और फिर अप्रैल 2026 में वे भी दुनिया को अलविदा कह गईं।
आज भले ही वे दोनों हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब चुरा लिया है तुमने या मेरा कुछ सामान प्लेलिस्ट में बजता है, तो ऐसा लगता है कि वे दोनों आज भी अपने उसी स्टूडियो में बैठे हैं..
पंचम दा कोई अजीब सी धुन गुनगुना रहे हैं और आशा जी उसे अपनी आवाज़ से अमर बना रही हैं।
किस्से ख़त्म हो सकते हैं, पर ऐसी मोहब्बत और ऐसा संगीत कभी नहीं मरता।
जन्मदिन की शुभकामनाएं आशा ताई,
आपको इन दोनों की जोड़ी का कौन सा गीत पसंद है..?
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