अखबार में फोटोग्राफर से फिल्म निर्माता तक का सफर तय करने वाले यश जौहर की है आज जन्मजयंती

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

साल 2000 के दशक की शुरुआत में एक दूरदर्शन के इंटरव्यू में जब दिग्गज निर्माता यश जौहर से पूछा गया कि एक इंडिपेंडेंट प्रोड्यूसर के तौर पर वे पैसे की बचत कैसे करते हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था कि
फिल्म प्रोडक्शन में पैसा आपका दुश्मन नहीं होता, वक्त आपका दुश्मन होता है। अगर आप अपने लोगों का ख्याल रखेंगे, तो वक्त आपका साथ देगा और फिल्म खुद-ब-खुद खूबसूरत बनेगी।

यश जी ने इंटरव्यू में जिस वक्त को अपना सबसे बड़ा गुरु और दुश्मन बताया था, उस वक्त ने उनका खुद का कड़ा इम्तिहान लिया था।

यश जौहर का जन्म 6 सितंबर 1929 को पंजाब के लाहौर में हुआ था, देश के विभाजन के बाद उनका परिवार विभाजन के बाद दिल्ली आया था, जहां उनके पिता ने एक मिठाई की दुकान खोली थी। चूंकि वे अपने भाई-बहनों में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे, इसलिए पिता ने उन्हें दुकान का हिसाब-किताब संभालने का काम दिया, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था…तब वे मुंबई भाग आए थे..
मुंबई आकर उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में एक फोटोग्राफर का काम किया।
कहा जाता है कि उस जमाने की मशहूर अभिनेत्री मधुबाला अपनी फोटो किसी को नहीं लेने देती थी.. यश जी पढ़े लिखे समझदार व्यक्ति थे और अच्छी इंग्लिश बोलते थे, उनके अच्छे इंग्लिश बोलने से प्रभावित होकर मधुबाला ने उनसे अपनी फोटो खिंचवाई थी…

यश जौहर ने फिल्म निर्माण की बारीकियां सेट्स पर काम करके सीखी थीं।
उन्होंने सुनील दत्त के बैनर अजंता आर्ट्स के साथ फिल्म मुझे जीने दो से बतौर प्रोडक्शन कंट्रोलर काम शुरू किया।

इसके बाद वे दिग्गज अभिनेता देव आनंद की मशहूर कंपनी नवकेतन फिल्म्स से जुड़ गए और वहाँ उन्होंने गाइड, ज्वेल थीफ, और हरे रामा हरे कृष्णा, जैसी क्लासिक फिल्मों का प्रोडक्शन संभाला।

जब फिल्म गाइड बन रही थी, तब देव आनंद और निर्देशक चेतन आनंद लीड रोल में वहीदा रहमान को कास्ट नहीं करना चाहते थे।
उस समय यश जौहर नवकेतन फिल्म्स में प्रोडक्शन मैनेजर थे। उन्होंने देव आनंद को समझाया कि वहीदा जी इस रोल के लिए बिल्कुल परफेक्ट हैं और अंततः उनकी बात मानी गई। यह फिल्म आज भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है।

साल 1976 में यश जौहर ने अपनी खुद की कंपनी धर्मा प्रोडक्शंस की शुरुआत की। इस बैनर तले उनकी पहली फिल्म अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा स्टारर दोस्ताना थी, जो ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी…

इसके बाद उन्होंने अग्निपथ गुमराह और डुप्लीकेट जैसी फिल्में बनाईं। हालांकि, इनमें से कुछ फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली, जिससे उन्होंने काफी कठिन समय भी देखा..

90 के दशक के आखिरी सालों में उनके बेटे करण जौहर ने उनकी प्रोडक्शन कंपनी संभाली। बतौर प्रोड्यूसर उनके आखिरी सालों में आई फिल्में कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी गम और कल हो ना हो जो उस वक्त ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी।

सिनेमाई दुनिया से परे, यश जौहर एक अद्भुत इंसान थे। पूरी फिल्म इंडस्ट्री उन्हें सम्मान और प्यार से यश अंकल कहती थी..
आउटडोर शूटिंग के दौरान यश जौहर खुद खड़े होकर यह सुनिश्चित करते थे कि फिल्म के सबसे बड़े स्टार से लेकर सबसे छोटे लाइटमैन और स्पॉटबॉय तक, सभी को एक जैसा और सबसे बेहतरीन खाना परोसा जाए।

दूरदर्शन के उस दौर में इंडस्ट्री में एक बात मशहूर थी कि यश जौहर के साथ काम करने के लिए किसी कानूनी कागज या लंबे-चौड़े एग्रीमेंट की जरूरत नहीं होती थी। यश जौहर ने अगर किसी डिस्ट्रीब्यूटर या एक्टर से कोई वादा कर दिया, तो चाहे उन्हें खुद कितना भी भारी नुकसान क्यों न उठाना पड़े, वे अपनी जुबान से पीछे नहीं हटते थे।

26 जून 2004 को कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद यश जी दुनिया से चले गए। उनके जीवन का सबसे बड़ा मलाल यह था कि उनकी सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म अग्निपथ बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल सकी थी,
हालांकि अमिताभ बच्चन को इसके लिए नेशनल अवार्ड मिला था।

पिता के इसी अधूरे सपने को पूरा करने के लिए करण जौहर ने 2012 में ऋतिक रोशन के साथ अग्निपथ का रीमेक बनाया, जो ब्लॉकबस्टर रही थी, ये फ़िल्म करण ने अपने पिता के लिए बनाई थी…

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