
प्रीति सिंह, गाजियाबाद उत्तरप्रदेश
सोचिए, एक इंसान जिसके दादा त्रिपुरा के राजा हों, माँ मणिपुर की राजकुमारी हों, और जिसके पास नौकर-चाकर और ऐश-ओ-आराम की कोई कमी न हो… वो अचानक एक दिन अपना सब कुछ छोड़ दे। क्यों?
क्योंकि उसे मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में जाकर गाने बनाने थे!
ये कोई फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि यह हकीकत है सचिन देव बर्मन की, जिन्हें पूरी दुनिया प्यार से बर्मन दा कहती है।
आज यानी 1 अक्टूबर को उनका जन्मदिन है। आज मैं आपको उनके बर्थडे पर उनके महल से लेकर मुंबई के स्टूडियो तक की पूरी और बेहद दिलचस्प कहानी बताती हूँ..पसंद आए तो लाइक शेयर कीजिएगा, ❤️
एस. डी. बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर 1906 को कमिला जो अब बांग्लादेश में है, वहाँ हुआ था।वे त्रिपुरा के शाही राजवंश के राजकुमार थे। उनके पिता नवद्वीपचंद्र देव बर्मन त्रिपुरा के महाराज ईशानचंद्र मणिक्य के बेटे थे और उनकी माता मणिपुर की राजकुमारी थीं।
महल में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन सचिन देव का मन बचपन से ही लोकगीतों, बांसुरी की तान और नदियों के किनारे गूंजने वाले मल्लाहों के गानों में रमता था।
जब बर्मन दा ने संगीत को अपना करियर बनाने की सोची, तो उनके परिवार ने इसका कड़ा विरोध किया। उस जमाने में राजा-महाराजाओं के घर के लड़कों का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था।
लेकिन बर्मन दा पर तो धुन सवार थी। उन्होंने अपनी शाही गद्दी और विरासत का हक हमेशा के लिए छोड़ दिया और आम इंसान बनकर संगीत सीखने निकल पड़े।
शाही ठाट-बाठ छोड़ने के बाद बर्मन दा ने संगीत को शास्त्रीय रूप से सीखना शुरू किया।
उन्होंने मशहूर सारंगी वादक उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से शास्त्रीय संगीत के गुर सीखे। इसके बाद उस्ताद आफताबुद्दीन खान से बांसुरी वादन सीखा।
1930 के दशक में उन्होंने कलकत्ता रेडियो स्टेशन पर बतौर गायक काम करना शुरू किया। उनकी थोड़ी सी नाक से गाई जाने वाली आवाज़ बंगाली श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई। उन्होंने कई बंगाली गैर-फिल्मी गाने रिकॉर्ड किए जो आज भी चाव से सुने जाते हैं।
बर्मन दा ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बंगाली सिनेमा से की थी।
उन्होंने बतौर गायक और संगीतकार 1937 में आई बंगाली फिल्म राजगी से शुरू किया था। और पहली सफलता उन्हें साल 1940 में आई फिल्म राजकुमारेर निर्बाशन से मिली जिसने उन्हें बंगाल में एक स्वतंत्र और सफल संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया।
इसके बाद उन्होंने कई बंगाली फिल्मों में सुपरहिट संगीत दिया।
इसके बाद वे साल 1944 में मशहूर फिल्म निर्माता शशाधर मुखर्जी के कहने पर कोलकाता छोड़कर मुंबई आ गए, लेकिन यहाँ का शुरुआती सफर बहुत मुश्किलों भरा था।
बॉलीवुड में बतौर संगीतकार उनकी पहली हिंदी फिल्म शिकारी थी जो 1946 में रिलीज़ हुई थी, जिसमें अशोक कुमार मुख्य भूमिका में थे। इसी साल उन्होंने आठ दिन नाम की फिल्म भी की।
इन दोनों फ़िल्मों से उन्हें कुछ पहचान तो मिली, लेकिन वे बड़े स्तर पर हिट नहीं हो पा रहे थे।
इसके बाद साल 1947 में आई फिल्म दो भाई बर्मन दा के करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। इस फिल्म में उन्होंने एक नई गायिका गीता दत्त से से गाना गवाया-
मेरा सुंदर सपना बीत गया…
ये गाना पूरे देश में इस कदर हिट हुआ कि बर्मन दा रातों-रात हिंदी सिनेमा का बड़ा नाम बन गए और गीता दत्त के करियर की गाड़ी भी चल पड़ी।
लेकिन दो भाई की सफलता के बाद भी बर्मन दा को मुंबई का व्यावसायिक माहौल में ख़ुद को ढाल नहीं पा रहे थे। भाषा की समस्या और लगातार कुछ फिल्में फ्लॉप होने के कारण वे बेहद हताश हो गए और उन्होंने तय कर लिया कि वे पहली ट्रेन पकड़कर वापस कोलकाता लौट जाएंगे।
बर्मन दा जब अपना बैग पैक कर रहे थे, तब मशहूर अभिनेता अशोक कुमार उनके पास पहुंचे। चूँकि वे बर्मन दा के हुनर को खोना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने बर्मन दा को समझाया और अपनी फिल्म मशाल में संगीत देने के लिए मना लिया।
इस फिल्म के गाने बहुत हिट हुए और बर्मन दा अब मुंबई में ही रुक गए।
1950 के दशक की शुरुआत के साथ ही बर्मन दा के करियर का सबसे सुनहरा दौर शुरू हुआ, जिसने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री का बेताज बादशाह बना दिया।
देव आनंद की फिल्म कंपनी नवकेतन के साथ बर्मन दा का जुड़ाव ऐतिहासिक रहा।
साल 1951 में आई फिल्म बाज़ी ने हिंदी सिनेमा में संगीत की परिभाषा बदल दी।
इस फिल्म का गाना तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले…ब्लॉकबस्टर रहा था।
इस गाने वेस्टर्न और इंडियन म्यूजिक का एक बेहतरीन फ्यूजन था, जो बर्मन दा ने पान की दुकान पर खड़े होकर बनाया था,
दरअसल, बर्मन दा अक्सर मुंबई के लिंकिंग रोड पर एक खास पान की दुकान पर जाते थे। वहां एक लड़का अक्सर एक वेस्टर्न धुन गुनगुनाया करता था।
बर्मन दा ने उस धुन को पकड़ा, उसमें भारतीय तड़का लगाया और गीता दत्त की आवाज़ में उसे एक गज़ल-नुमा गाने में तब्दील कर दिया।
जब गाना हिट हुआ, तो उन्होंने उस पान वाले को बुलाकर इनाम भी दिया था।
इसके बाद उन्होंने देव आनंद के साथ टैक्सी ड्राइवर, मुनीम जी, पेइंग गेस्ट, काला पानी और नौ दो ग्यारह जैसी अनगिनत ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं।
फिल्ममेकर गुरुदत्त के साथ मिलकर बर्मन दा ने भारतीय सिनेमा को दो सबसे बेहतरीन फिल्में प्यासा और काग़ज़ के फूल दीं।
ये महलों ये तख्तों की दुनिया, जाने वो कैसे लोग थे जैसे गानों ने दर्द और रूमानियत का ऐसा जादू बिखेरा जो आज भी अमर है।
विजय आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म गाइड का संगीत बर्मन दा के पूरे करियर का सर्वश्रेष्ठ काम माना जाता है।
आज फिर जीने की तमन्ना है’, दिन ढल जाए हाय, और खुद बर्मन दा की आवाज में गाया गया गाना वहां कौन है तेरा मुसाफिर संगीत के इतिहास की अनमोल धरोहर हैं।
साल 1969 में आई फिल्म आराधना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। इस फिल्म के गानों मेरे सपनों की रानी, रूप तेरा मस्ताना ने किशोर कुमार को रातों-रात सुपरस्टार सिंगर बना दिया।
1970 के दशक में भी बर्मन दा का जादू बरकरार था। उन्होंने अभिमान और चुपके चुपके जैसी फिल्मों में कमाल का संगीत दिया।
साल 1975 में फिल्म मिली के गाने बड़ी सूनी सूनी है ज़िंदगी की धुन तैयार करने के बाद उन्हें पैरालिसिस का गंभीर अटैक आया और वे कोमा में चले गए।
उनके अधूरे काम को उनके बेटे आर. डी. बर्मन ने पूरा किया। आखिरकार 31 अक्टूबर 1975 को इस महान संगीतकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
आज बर्मन दा को उनकी जयंती की शुभकामनाएँ
अब आप बताइए कि आपको उनका कौन सा गाना सबसे ज्यादा पसंद है? ❤️❤️
#music #bollywood #films

