सिर्फ रोमांटिक गाने ही नहीं लिखे, क्रांतिकारी और वामपंथी विचारधारा के गंभीर शायर भी थे मजरूह

आज जन्मदिन

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

ये बात तब की है जब फिल्म कयामत से कयामत तक से आमिर खान स्टार बनने जा रहे थे।
इस फिल्म के निर्माता नासिर हुसैन जो मजरूह सुल्तानपुरी के गहरे दोस्त थे, और निर्देशक मंसूर खान थे।
मंसूर खान चाहते थे कि फिल्म के लिए एक ऐसा गाना हो जिसमें कॉलेज वाले युवा पीढ़ी कनेक्ट कर सकें।

तब नासिर हुसैन ने अपने दोस्त मजरूह साहब से गाना लिखने को कहा।

मजरूह साहब ने जब गाने का पहला अंतरा लिखकर सुनाया, तो नासिर हुसैन को लगा कि यह मजरूह के स्तर की शायरी नहीं है।

नासिर हुसैन ने गुस्से में मजरूह से कहा, “क्या, मजरूह, तुम इतने बड़े शायर हो, ये तुमने क्या घिसी-पिटी और मामूली लाइनें लिखी हैं?”

इस पर मजरूह साहब ने हंसते हुए जवाब दिया, “नासिर, ये गाना आमिर खान जैसे आज के कॉलेज के लड़के पर फिल्माया जाना है। अगर मैं इसमें भारी-भरकम उर्दू के शेर लिख दूंगा, तो आज का युवा इसे नहीं समझेगा। ये आज की पीढ़ी की जुबान है।”

और उस दिन मजरूह साहब सही थे, “पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा” गाना रिलीज होते ही देश का नेशनल एंथम बन गया!

आज ही के दिन यानी 1 अक्टूबर साल 1919 में उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे मजरूह सुल्तानपुरी की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे सिचुएशन के हिसाब से गाने लिख देते थे।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि मजरूह साहब शुरुआत में फ़िल्मों में गाने नहीं लिखना चाहते थे?

वे मुशायरों के बड़े शायर थे और उन्हें लगता था कि फिल्मों में लिखना अपने साहित्यिक स्तर को कम करना है। लेकिन उनके उस्ताद जिगर मुरादाबादी के समझाने पर वे फ़िल्मों में लिखने के लिए राजी हुए।

ये बात साल 1945 की है। मजरूह सुल्तानपुरी मुंबई के एक मुशायरे में अपने उस्ताद और महान शायर जिगर मुरादाबादी के साथ मुशायरे में अपनी ग़ज़ल पेश कर रहे थे, उसी मुशायरे में फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार और संगीतकार नौशाद भी मौजूद थे।

कारदार साहब अपनी नई फिल्म शाहजहाँ के लिए पहले जिगर मुरादाबादी को गीत लिखने का ऑफर देना चाहते थे। लेकिन जिगर मुरादाबादी ने ये कहते हुए साफ़ मना कर दिया कि मैं तो नहीं लिख सकता लेकिन मेरा एक शागिर्द है मजरूह, वो कमाल का लिखता है। आप एक बार उसे मौका दीजिए।

जब कारदार साहब ने मजरूह को ऑफर दिया, तो मजरूह ने भी फिल्मों में लिखने से इनकार कर दिया, तब उस्ताद जिगर मुरादाबादी ने मजरूह को अकेले में बुलाया और उन्हें समझाया कि शायरी से ज़िंदगी नहीं चलती, तुम अभी जवान हो, कल के दिन परिवार बड़ा होगा, तब यही फ़िल्मों में लिखना काम आएगा।
जिगर साहब के कहने पर मजरूह सुल्तानपुरी तैयार हुए,

उन्होंने फिल्म शाहजहाँ के लिए अपना पहला गाना लिखा “जब दिल ही टूट गया…”।
इसे महान गायक के.एल. सहगल ने गाया था। ये गाना सुपरहिट हुआ था और सहगल साहब इस गीत के शब्दों और मजरूह की गहराई से इस कदर प्रभावित हुए कि यह गाना उनकी आत्मा का हिस्सा बन गया।

सहगल साहब ने अपनी वसीयत में बाकायदा ये लिखवाया था कि
“जब मेरा निधन हो, तो मेरी अंतिम यात्रा में केवल यही गाना बजाया जाए।”

साल 1947 में जब सहगल साहब का निधन हुआ, तो उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक इसी गाने को बजाया गया था।
अपनी पहली ही फिल्म से मजरूह साहब ने इतिहास लिख दिया था।

मजरूह सुल्तानपुरी सिर्फ रोमांटिक गाने नहीं लिखते थे, वे बुनियादी तौर पर एक क्रांतिकारी और वामपंथी विचारधारा के गंभीर शायर थे।

वे वामपंथी विचारों के प्रति इतने समर्पित थे कि 1949 में, बम्बई में मिल मजदूरों की एक सभा में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ एक तीखी और विवादित राजनीतिक कविता पढ़ी थी।

इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनके सामने शर्त रखी गई कि वे माफी मांग लें तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा। लेकिन मजरूह साहब अपने स्वाभिमान और सिद्धांतों के इतने पक्के थे कि उन्होंने माफी मांगने से साफ मना कर दिया और आर्थर रोड जेल में एक साल से ज्यादा का वक्त काटा।
जेल में रहते हुए भी उन्होंने लिखना बंद नहीं किया।

मजरूह साहब की सबसे बड़ी खूबी ये थी कि वे पाँच दशकों तक कभी पुराने नहीं हुए। उन्होंने जहां 1940 के दशक में के.एल. सहगल के लिए दर्दभरे गीत लिखे, वहीं 1970 के दशक में आर.डी. बर्मन के साथ चुरा लिया है तुमने जो दिल को और ओ मेरे दिल के चैन जैसे सदाबहार रोमांटिक गाने दिए।

इतना ही नहीं, जब 1980 और 90 का दौर आया, तो उन्होंने बिल्कुल नए अंदाज में आमिर खान की फिल्मों के लिए पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा और पहला नशा, पहला खुमार जैसे यूथ-एंथम लिख डाले।

वे भारतीय सिनेमा के सबसे शानदार और प्रसिद्ध उर्दू कवियों और हिंदी फिल्म गीतकारों में से एक थे और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होने वाले इतिहास के पहले गीतकार बने।

उन्होंने अपने पांच दशकों से अधिक के लंबे करियर में, 350 से अधिक फिल्मों में लगभग 2,000 गाने लिखे।

मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार उल हसन खान था, लेकिन शायरी की दुनिया में उन्होंने मजरूह नाम चुना, जिसका अर्थ होता है-घायल।
उन्होंने अपने जीवन के सफर और कामयाबी को इस मशहूर शेर में बयां किया था, जो आज भी बेहद लोकप्रिय है-

“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया॥”

24 मई 2000 को मजरूह साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनके लिखे गाने आज भी जब बजते हैं, तो ऐसा लगता है कि शब्दों का वह सुल्तान आज भी हमारे बीच जिंदा है।

जन्मदिन की शुभकामनाएँ मजरूह साहब।

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