और दिग्वी मर गया

अपनी बात…
शरद कोठारी
“और दिग्वी मर गया…” का दूसरा संस्करण निकालने की आवश्यकता बहुत पहले ही अनुभव की जा रही थी। दस वर्ष पूर्व नांदगाँव रियासत के नौजवान राजा दिग्विजय दास की कहानी का चुनाव मैंने इसलिए किया था कि सामन्ती – व्यवस्था में एक ऐसा चरित्र मुझे मिला था, जिसमें अकूत भावुकता, मानवीयता और जनसमस्याओं के प्रति जागरूकता थी। दिग्वी की अप्राकृतिक रहस्यात्मक मृत्यु ने रियासत की जनता के हृदय करूणा से भर दिए थे।

लंबा समय इस बीच गुजर गया। सैकडो़ं नए पाठकों ने “दिग्वी मर गया…” उपन्यास का नाम तो सुना था, किन्तु उन्हें पुस्तक नहीं मिलती थी। वे मुझसे आग्रह करते थे कि एक और संस्करण निकाला जाए। यद्यपि मेरी इतनी रूचि अब नहीं थी क्योंकि मुझे लगता था राजनांदगाँव में पाठकों की एक नई पीढी़ जो उस समय शैशव अवस्था में थी, दिग्वी के संबंध में अवश्य जानना चाहेगी। दैनिक सबेरा संकेत में आफसेट मुद्रण की सुविधा ने मुझे प्रेरित किया कि एक और संस्करण निकाला जा सकता है। हमारे कम्प्यूटर सहयोगी श्री नायर ने यह काम हाथ में लिया और परिणामत: तीसरा संस्करण प्रस्तुत है।

प्रस्तुत उपन्यास के चरित्र समाज में कहीं न कहीं हैं। उन्होंने अपनी तस्वीर इस कृति में देखी है। लालबाग को मैंने जनता की करूणा का प्रतीक माना है। इन पात्रों के द्वारा स्वार्थ-लोलुप, चाटुकार और अवसरवादी लोगों का चित्रण है। किस तरह राजा की मौत को एक साधारण बात मानकर सम्पत्ति हड़पने के षड़यंत्र होते हैं, यह पूंजीवादी-सामंतों, संस्कारयुक्त समाज की विशेषता है, जहाँ मानवीय गुणों को भी सान चढा़ दिया जाए जबकि वे गुण एक सामन्ती चरित्र में भी उपलब्ध हो सकते हैं।

यह मैं अनुभव कर सका हूं कि पाठकों ने कहानी को पसंद किया है, रियासती भौगोलिक सीमा से बाहर इसकी मांग संभवत: रोचकता के कारण हुई हो।

पुस्तक का यह तीसरा संस्करण प्रस्तुत करते हुए मुझे बडी़ प्रसन्नता हो रही है।