
जैन बगीचे में श्रेयांशप्रभ जी का चातुर्मासिक प्रवचन
राजनांदगांव। “आत्मा की खुशी और शांति के लिए आत्म चिंतन जरूरी है ! किसी भी चीज की प्राप्ति के लिए समय तो लगता ही है। हमें इंतजार करना होगा और आत्मिक शांति को पाने का प्रयास करना होगा। परफेक्शन जब आएगा तब आएगा, किंतु हमें उसके लिए प्रयास तो करना ही होगा।” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री श्रेयांशप्रभ सागर जी ने फरमाया कि हमने कमाया इसलिए कि हम शांति के साथ जी सके। खोने का डर सबको सताता रहता है किंतु बाहरी चीजों के खोने का डर क्यों ! मुनिश्री ने कहा कि काम भी मैं कर रहा हूं,सो भी मैं रहा हूं,कमा भी मैं रहा हूं और खो भी मैं रहा हूं, जब चारों तरफ मैं ही मैं हूं तो फिर बाहरी चीजों से डर क्यों? हमें केवल इतना ही सोचना है कि आत्मा को क्या करना चाहिए और क्या नहीं। आत्मा की शांति और खुशी के लिए हमें चिंतन जरूर करना चाहिए।
मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि हम किसी भी चीज को पाने के लिए डिले करते हैं। हम चिंतन करें और उसे प्राप्त करने का प्रयास करें। जो मैं हूं और जो मुझे चाहिए,इसके बीच काफी दूरियां है। इन दूरियों को कम करने के लिए हमें चिंतन के साथ-साथ प्रयास करना होगा। इसके लिए हम डिले (विलम्ब ) ना करें। डिले (विलम्ब ) को खतरा मानकर काम करें और इसे दूर कर आत्म शांति प्राप्त के लिए जुट जाओ।

