
समझिए पूरी हकीकत और सियासी घमासान
जितेंद्र जैन जीतू, राजनांदगाँव
छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण व्यवस्था के निजीकरण और इसे टाटा समूह को सौंपे जाने की खबरों ने सियासी पारे को गर्मा दिया है। विपक्ष जहां सरकार पर बिजली व्यवस्था को निजी हाथों में बेचने की तैयारी का आरोप लगा रहा है, वहीं राज्य सरकार ने इन दावों को पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन करार दिया है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक टाटा पावर कंपनी लिमिटेड ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) के समक्ष एक याचिका (क्रमांक 89/2026) दायर की है। कंपनी ने रायपुर जिले की चार तहसीलों—रायपुर, धरसीवां, मंदिर हसौद और अभनपुर के भौगोलिक क्षेत्र में बिजली आपूर्ति के लिए ‘समानांतर वितरण लाइसेंस’ की मांग की है।
विद्युत अधिनियम 2003 के नियमानुसार, किसी भी निजी कंपनी को वितरण लाइसेंस के लिए नियामक आयोग में आवेदन करने का वैधानिक अधिकार है। आयोग ने इस आवेदन पर नियमानुसार आम जनता, संस्थाओं और उपभोक्ताओं से आपत्तियां व सुझाव मांगे हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा सरकारी वितरण कंपनी (CSPDCL) का निजीकरण किया जा रहा है या उसकी परिसंपत्तियां टाटा को बेची जा रही हैं।
समानांतर लाइसेंस मॉडल, समानांतर लाइसेंस का मतलब होता है कि उसी क्षेत्र में सरकारी कंपनी के साथ-साथ एक निजी कंपनी भी प्रतिस्पर्धी के रूप में काम कर सके, जिससे उपभोक्ता के पास विकल्प हो सके।
सूत्रों का कहना है कि आयोग के पास केवल आवेदन आया है। जिसे आयोग कानूनी वैधता, तकनीकी व्यवहार्यता और जनसुनवाई के बाद ही तय करता है कि लाइसेंस दिया जाए या नहीं।
इस मामले में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि राज्य सरकार की बिजली व्यवस्था के निजीकरण की कोई मंशा नहीं है। उन्होंने कहा कि नियामक आयोग एक स्वायत्त निकाय है और किसी भी आवेदन पर सुनवाई करना एक नियमित वैधानिक प्रक्रिया है। इसे राज्य सरकार द्वारा निजीकरण का नीतिगत फैसला बताना पूरी तरह निराधार और जनता को भ्रमित करने वाला दुष्प्रचार है। प्रदेश की सरकारी बिजली व्यवस्था सुचारू रूप से कार्य कर रही है। वहीं इस मामले में
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने आरोप लगाया कि रायपुर जैसे अधिक राजस्व वाले शहरी इलाकों में निजी कंपनी को प्रवेश देना भविष्य में पूरे बिजली ढांचे के निजीकरण की शुरुआत हो सकती है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
इंजीनियर संघ का विरोध, सूत्रों के अनुसार इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल पत्रोपाधि अभियंता संघ ने भी आयोग के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई है। संघ का तर्क है कि यदि निजी कंपनी केवल मुनाफा देने वाले शहरी/औद्योगिक इलाकों में जाएगी, तो सरकारी कंपनी की ‘क्रॉस-सब्सिडी’ और वित्तीय स्थिरता प्रभावित होगी तथा कर्मचारियों के सेवा हितों पर असर पड़ सकता है।
कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में बिजली तंत्र को टाटा के हाथों बेचने या सरकारी कंपनी का निजीकरण करने का कोई सरकारी फैसला नहीं हुआ है। केवल एक निजी कंपनी ने रायपुर के सीमित क्षेत्र में वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया है, जो वर्तमान में नियामक आयोग की कानूनी जांच और जनसुनवाई के अधीन है।


