
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
जब भी भारतीय सिनेमा में देशभक्ति या युद्ध पर आधारित फिल्मों की बात होती है, तो सबसे पहला नाम जे. पी. दत्ता का आता है। उन्होंने बॉलीवुड को बड़े कैनवास पर फिल्में देखना सिखाया।
3 अक्टूबर 1949 को मुंबई में जन्मे जे. पी. दत्ता के पिता ओ. पी. दत्ता भी एक फिल्म लेखक थे, इसलिए सिनेमा की समझ उन्हें बचपन से ही मिली।
जे. पी. दत्ता ने बतौर डायरेक्टर साल 1976 में सरहद नाम की फिल्म से शुरुआत की थी, इस फ़िल्म में विनोद खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती, और बिंदिया गोस्वामी मुख्य किरदारों में थे, लेकिन विनोद खन्ना ने कुछ कारणों से फ़िल्म से दूरी बना ली जिसके चलते फ़िल्म बन नहीं पाई और बंद हो गई।
साल 1985 में उन्होंने बतौर निर्देशक अपनी पहली सफल फिल्म गुलामी बनाई।
इसके बाद उन्होंने यतीम, बंटवारा और क्षत्रिय जैसी एक्शन-ड्रामा फिल्में बनाईं। इन शुरुआती फिल्मों में भी राजस्थान का रेगिस्तान, सामंती व्यवस्था और मल्टीस्टारर कास्ट उनकी पहचान बन चुकी थी।
साल 1997 में आई फिल्म बॉर्डर उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। यह फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। जे. पी. दत्ता के लिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि उनका एक निजी अनुभव था।
दरअसल, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जे. पी. दत्ता के छोटे भाई दीपक दत्ता भारतीय वायु सेना में एक पायलट थे। जब जंग चल रही थी, तो दत्ता ने अपने घर में उस खौफ और चिंता को जिया था, जहाँ उनकी माँ हर वक्त रेडियो से चिपकी रहती थीं कि कहीं कोई बुरी खबर न आ जाए।
हालांकि उनके भाई सुरक्षित लौट आए और बाद में एक अन्य हादसे में उनका निधन हुआ था, लेकिन उस युद्ध ने दत्ता के दिमाग पर गहरा असर छोड़ा। वे अक्सर अपनी डायरी में उस दौर के अहसासों को लिखा करते थे।
और इस तरह फ़िल्म बॉर्डर की कहानी का जन्म हुआ।
जब उन्होंने लोंगेवाला की लड़ाई पर फिल्म बनाने की सोची, तो उन्होंने तय किया कि वे इस फिल्म में कोई समझौता करेंगे।
तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से स्क्रिप्ट की अनुमति लेकर वे कलाकारों को लेकर राजस्थान के थार मरुस्थल की 45 डिग्री वाली झुलसाती धूप में गए।
भारतीय सेना के सहयोग से असली 55-टैंक और लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल हुआ। धूप और धूल के बीच हफ्तों तक शूटिंग करने की वजह से सेट पर एक्टर्स थक जाते थे, सनी देओल के साथ स्क्रीन टाइम और बेहद कठिन शूटिंग परिस्थितियों को लेकर उनके गहरे मतभेद भी हुए, लेकिन दत्ता अपनी जिद पर अड़े रहे।
13 जून 1997 को जब फिल्म रिलीज हुई, तो इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। सिर्फ 12 करोड़ रुपये में बनी इस फिल्म ने 66 करोड़ से ज्यादा की कमाई की और इसे राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला।
बॉर्डर की सफलता के बाद दत्ता पूरी तरह वॉर फिल्मों के लिए समर्पित हो गए।
साल 2000 में उन्होंने भारत-पाक सीमा की पृष्ठभूमि पर रिफ्यूजी बनाई, जिससे अभिषेक बच्चन और करीना कपूर ने बॉलीवुड डेब्यू किया इसके बाद उन्होंने कारगिल युद्ध पर बॉलीवुड के इतिहास की सबसे लंबी फिल्मों में से एक एलओसी: कारगिल और फिर पलटन का निर्देशन किया।
जे. पी. दत्ता ने मशहूर अभिनेत्री बिंदिया गोस्वामी से शादी की है, उनकी पहली मुलाकात बिंदिया से उसी अधूरी फिल्म सरहद के सेट पर हुई थी। शुरुआत में दोनों के बीच दोस्ती हुई, जो समय के साथ प्यार में बदल गई।
जब दोनों ने शादी करने का फैसला किया, तो दोनों के परिवारों ने इस रिश्ते का कड़ा विरोध किया, परिवार के इस भारी विरोध के बावजूद, दोनों ने अपने प्यार को चुना और साल 1985 में घर से भागकर शादी कर ली।
शादी के बाद बिंदिया ने एक्टिंग छोड़ दी और वे जे. पी. दत्ता की फिल्मों में कॉस्ट्यूम डिजाइनर के तौर पर उनका साथ देने लगीं।
उनकी दो बेटियां हैं- निधि दत्ता और सिद्धि दत्ता। उनकी बेटी निधि दत्ता भी फिल्म निर्माण क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं।
जे. पी. दत्ता का नाम इतिहास में एक ऐसे फिल्ममेकर के तौर पर दर्ज है, जिन्होंने भारतीय जवानों की बहादुरी को बड़े पर्दे पर पूरी ईमानदारी के साथ पेश किया है। आज भी जब देश में देशभक्ति की फिल्मों का जिक्र होता है, तो उनकी बनाई बॉर्डर को सबसे बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।
जन्मदिन की शुभकामनाएं
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