
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
राजकुमार…..
इनका नाम लेते ही सबसे पहला शब्द ज़हन में क्या आता है…..
“जानी’…”
लेकिन ये किसी फ़िल्म का डायलॉग नहीं था,
ये उनकी अपनी एक आदत थी जो बाद में उनकी पहचान बन गई। और इस पहचान मिलने के पीछे तीन दिलचस्प किस्से हैं, आप भी पढ़िए
मशहूर फ़िल्म निर्माता केसी बोकाड़िया ने एक इंटरव्यू में बताया था कि
राजकुमार के पास एक पालतू कुत्ता था, जिसे राजकुमार प्यार से जानी बुलाते थे, और धीरे धीरे ये शब्द उनकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि वो अपने जानने वालो को भी जानी बुलाने लगे।
आज यानी 8 अक्टूबर को उनका जन्मदिन है,
8 अक्टूबर 1926 को पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान में जन्मे राजकुमार का असली नाम कुलभूषण पंडित था।
फ़िल्मों में आने से पहले वो पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर की नौकरी करते थे। तब वे थाने में अपनी रौबीली आवाज़ से अपराधियों को भी जानी बुलाते थे।
उनके फ़िल्मों में आने की कहानी भी काफ़ी इंटरेस्टिंग है।
कहा जाता है कि एक बार वो रात में पेट्रोलिंग पर निकले, तब उनके साथ चल रहे एक सिपाही ने उनसे कहा कि
“सर, आप देखने में किसी हीरो से कम नहीं लगते, अगर आप फ़िल्मों में चले जाएं तो आग लगा देंगे..
बस फिर क्या था, ये बात राजकुमार के दिल में बैठ गई, और उन्होंने फ़िल्मों में जाने का फ़ैसला कर लिया।
जिस पुलिस स्टेशन में वो काम करते थे वो फ़िल्म इंडस्ट्री के क़रीब ही था और फ़िल्मी लोगों का आना जाना लगा रहता था।
एक दिन मशहूर निर्देशक बलदेव दुबे किसी काम से थाने आए थे।
वहाँ उन्होंने राजकुमार के उठने बैठने , रौबीली आवाज़ को नोटिस किया और वो राजकुमार से इतने प्रभावित हुए कि तुरंत उन्हें अपनी फ़िल्म शाही बाज़ार का ऑफर दे दिया।
राजकुमार तो जैसे इसी मौके की तलाश में थे उन्होंने तुरंत नौकरी से इस्तीफ़ा दिया और फ़िल्मी दुनिया में आ गए।
लेकिन क़िस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था,
जिस शाही बाजार के लिए उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ी, वो फ़िल्म किन्हीं कारणों से बन नहीं सकी।
लेकिन राजकुमार ने हिम्मत नहीं हारी,
और आख़िरकार साल 1952 में फ़िल्म रंगीली से बॉलीवुड में डेब्यू किया।
इसके बाद 1957 में आई ऑस्कर नामांकित फ़िल्म मदर इंडिया ने उनकी क़िस्मत का सितारा चमका दिया,
राजकुमार स्टार बन गए थे, लेकिन उनकी जानी कहने की खास आदत नहीं बदली..
वो अक्सर अपनी फ़िल्मों में ख़ुद ही डायलॉग इम्प्रोवाइज कर दिया करते थे और जब डायरेक्टर उन्हें टोकते तो कहते ये लेखक क्या “जानी” की जुबान को समझेंगे..
उनका जानी कहने का अंदाज इतना अलग था कि उन्होंने ख़ुद ही अपनी फ़िल्मों में जानी बोलना शुरू कर दिया।
और साल 1991 में आई फ़िल्म सौदागर में राजकुमार ने जब दिलीप कुमार के सामने बड़े ही रौबीले अंदाज़ में कहा
जानी… हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे, लेकिन वो बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक़्त भी हमारा होगा!”
बस यही से जानी हर सिनेमा प्रेमी के जुबान पर चढ़ गया।
राजकुमार ने अपने चार दशक के करियर में लगभग ७० फ़िल्मों में काम किया और अपने अलग अंदाज़ के कारण डायलॉग किंग कहलाए।
पर्दे पर कड़क दिखने वाले राजकुमार अपनी असल ज़िंदगी में बहुत ही प्राइवेट इंसान थे। वो अपनी पर्सनल लाइफ को मीडिया से दूर रखते थे।
राजकुमार ने 1960 के दशक में जेनिफ़र से शादी की थी, दोनों की मुलाक़ात एक हवाई यात्रा के दौरान हुई और पहली ही मुलाकात में एक दूसरे से प्यार हो गया, जिसके बाद दोनों ने हिंदू रीति रिवाजों से शादी कर ली और जेनिफर ने शादी के बाद अपना नाम बदलकर गायत्री कुमार रख लिया।
दोनों के तीन बच्चे, दो बेटे, एक बेटी हुई।
उनके बड़े बेटे पुरु राजकुमार एक एक्टर हैं जिन्होंने फ़िल्म बाल ब्रह्मचारी से बॉलीवुड में डेब्यू किया था और दूसरे बेटे पाणिनी राजकुमार डायरेक्शन से जुड़े हुए हैं।
राज कुमार के सिद्धांतों का अंदाजा इसी से लगता है कि जब उन्हें गले का कैंसर हुआ, तो ये बात सिर्फ उनके परिवारजनों को पता थी। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बीमारी का तमाशा बने और जिन लोगों ने उनका रौबीला चेहरा देखा था उनके सामने वो कमज़ोर दिखें।
उन्होंने अपने परिवार से कहा कि उनके अंतिम संस्कार के बाद ही मीडिया और इंडस्ट्री को खबर दी जाए।
इसीलिए जब 3 जुलाई 1996 को उनका निधन हुआ, तो उनके अंतिम संस्कार के बाद ही दुनिया को पता चला
राजकुमार चले गए, उनकी आवाज चली गई, उनका दौर भी चला गया…
पर जानी आज भी बाकी है।
जन्मदिन की शुभकामनाएँ
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