
शासन से करोडो़ं रूपए के अनुदान लेने वाली संस्था अंतिम संस्कार के लिए कंडे भी मुफ्त नहीं दे पा रही
राजनांदगाँव। शहर के मठपारा स्थित मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के लिए शव लेकर पहुँचे परिजनों से हो रही वसूली अब बंद होनी चाहिए। शहर के गौशाला पिंजरापोल द्वारा संचालित इस मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के लिए कंडे दिये जाने के एवज में परिजनों से राशि ली जाती है, जो निहायत ही गलत है। शासन से करोडो़ं रूपए अनुदान लेकर मुक्तिधाम सहित शहर के कई हिस्सों में जनसेवा के काम करने के नाम पर जमीनें लेकर गौशाला पिंजरापोल अपनी दुकान चलाने का काम कर रहा है और लोगों को मरने के बाद भी थोडी़ सी सहुलियत नहीं दे रहा है।
राजनांदगाँव शहर में वैसे तो अब कई हिस्सों में शम्शान गृह बन गए हैं, लेकिन पहले एक ही शम्शान गृह हुआ करता था वह है मठपारा स्थित मुक्तिधाम। इस मुक्तिधाम के कर्ताधर्ता बरसों से चंद लोग ही हैं। गौशाला पिंजरापोल इस मुक्तिधाम को संचालित करता है। मुक्तिधाम की अच्छी खासी जमीन के साथ ही गौशाला पिंजरापोल के पास शहर के बीचोबीच सिनेमा लाइन और आजाद चौक को जोड़ने वाली बेशकीमती जमीन है। पिंजरापोल के पास कलेक्टोरेट के सामने भी और हाईवे में उससे कुछ आगे भी बडी़ प्रापर्टी है। गौशाला पिंजरापोल की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि यह संस्था गाय सहित गौवंश के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करेगी और मनुष्यों की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार का भी काम करेगी। पर ऐसा हो नहीं रहा है।
अपनी बात करूं तो मेरी माँ की मृत्यु उस वक्त हो गई थी, जब मैं सिर्फ साढे़ चार साल का था। उस वक्त तो मेरी ज्यादा समझ नहीं थी, पर कुछ समय बाद जब मैं समझदार हुआ और मोहल्ले में एक गमी हुई तो शव लेकर मुक्तिधाम जाना हुआ। मैं मुक्तिधाम जाने से पहले कामठी लाइन में पूनमचंद जी कोठारी (अब दिवंगत) के घर पहुंचा। वे उस समय गौशाला पिंजरापोल के अध्यक्ष थे। मैंने उन्हें बताया कि मृतक गरीब परिवार का सदस्य था। उन्होंने तुरंत अपने एक कर्मचारी को भेजकर मुक्तिधाम में लकडि़यों के लिए रूपए न लिए जाने का संदेश भिजवा दिया। ये पुरानी बात है। तब आम लोगों (तब मैं बेहद सामान्य बच्चा ही था) की बात सुनी जाती थी, पर अब धंधा हो रहा है। बचपन का एक किस्सा यह भी है कि बचपन में मैं गौशाला में दूध लेने जाता था। वो दौर ऐसा था कि किलापारा, दुर्गाचौक और ब्राह्मण पारा के तकरीबन हर घर का दूध गौशाला से आता था, बाद में गौशाला पर चंद लोगों का ऐसा कब्जा हुआ कि पुराने लोग दूर कर दिए गए।
गौशाला पिंजरापोल की कमाई पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगा लेकिन अभी दो ताजा मसले हैं, जिन पर जिम्मेदार मौन धारण किए हुए हैं। जिम्मेदार नगर, प्रदेश और देश की राजनीति में निर्वाचित लोग और गौशाला पिंजरापोल के लोग भी। ये मसले हैं, शहर में आवारा भटकते गौवंश का और मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के लिए वसूली का।
भटकते गौवंश के लिए गौशाला पिंजरापोल की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है। नगर निगम और पुलिस विभाग के लोग ही सड़कों पर भटकते गौवंश के लिए कुछ हद तक सक्रिय नजर आते हैं लेकिन बेहद सीमित स्थिति में जबकि गौवंश शहर के हर हिस्से में सड़कों पर बैठे रहते हैं।
भटकते गौवंश के साथ ही अब गौशाला पिंजरापोल को मृत हुए लोगों के शवों के अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। शवों के अंतिम संस्कार के लिए मुफ्त कंडे दिए जाने चाहिए। आखिर शासन के अनुदान और दुकानों से कमाई का कुछ लाभ तो शहर की जनता को मिलना चाहिए। वैसे भी गरीब तबके के लोगों की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार के लिए नगर निगम गौशाला पिंजरापोल यानि मुक्तिधाम को भुगतान करता है। नगर निगम को भी इस व्यय से बचाने और मुक्तिधाम में मुफ्त कंडे दिलाने जनप्रतिनिधियों को पहल करना चाहिए।
मुक्तिधाम की (अ) व्यवस्था को लेकर गुगल ने क्या जानकारी दी, ये भी पढि़ए
राजनांदगांव शहर के मुक्तिधामों (जैसे लखोली/मठपारा, मोतीपुर, गोकुल नगर) की व्यवस्था को लेकर पिछले कुछ समय से स्थानीय नागरिकों द्वारा गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। शहर के मुक्तिधामों में शुल्क और व्यवस्था को लेकर मुख्य रूप से निम्नलिखित स्थितियां सामने आई हैं।पता तो यह भी चला है कि राजनांदगांव के मुक्तिधाम में प्रबंधन (जैसे गौशाला पिंजरापुर संस्था आदि) द्वारा ₹100 की रसीद काटी जाती है। इस पैसे का उद्देश्य वहां की व्यवस्थाओं का मेंटेनेंस करना बताया जाता है, लेकिन नागरिकों का आरोप है कि रसीद काटने के बावजूद वहां सुरक्षा और सुविधाओं का भारी अभाव है।
पीड़ितों और स्थानीय लोगों द्वारा शिकायत की गई है कि शाम के बाद मुक्तिधामों में कोई उचित देखरेख करने वाला नहीं होता। हाल ही में वहां एक ऐसा गंभीर मामला भी सामने आया था जहां लापरवाही के कारण एक परिवार के बेटे की अस्थियां गलती से दूसरे परिवार ने उठा लीं, जिससे शहरवासियों में काफी आक्रोश देखा गया था। इसके अलावा मोतीपुर मुक्तिधाम से लोहे की रेलिंग चोरी होने और कुछ जगहों पर असामाजिक तत्वों की संदिग्ध गतिविधियों की खबरें भी आईं।
राजनांदगांव नगर निगम द्वारा एल्डरमैन निधि से एक स्वर्ग रथ (शव वाहन) की व्यवस्था की गई है, जो पार्थिव शरीर को घर से मुक्तिधाम तक बिलकुल निःशुल्क पहुँचाती है। इसके लिए किसी भी तरह का शुल्क देना नियम विरुद्ध है।
यदि कोई कर्मचारी या बिचौलिया रसीद के अलावा लकड़ी, कंडों, या अंतिम संस्कार के नाम पर अलग से हजारों रुपये की मांग या जबरन वसूली करता है, तो वह पूरी तरह गलत है और बंद होनी चाहिए।पारदर्शिता और जवाबदेही ज़रूरी है। जो न्यूनतम ₹100 का शुल्क लिया जाता है, उसके बदले मुक्तिधाम प्रबंधन और नगर निगम को वहां सुरक्षा गार्ड, पर्याप्त रोशनी और अस्थियों की सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए। केवल रसीद काट लेना और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना सही नहीं है।यदि आपसे राजनांदगांव के किसी मुक्तिधाम में तय राशि से अधिक पैसों की मांग की गई है या किसी दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है, तो आप इसकी शिकायत राजनांदगांव नगर निगम के शिकायत सेल में या कलेक्टर जनदर्शन में सीधे दर्ज करा सकते हैं।
मुक्तिधाम (शमशान घाट) में अंतिम संस्कार के नाम पर होने वाली अवैध वसूली को पूरी तरह से बंद होना चाहिए। यह एक अत्यंत संवेदनशील और दुखद समय होता है, जहाँ किसी भी नागरिक से मजबूरी का फायदा उठाकर पैसे मांगना नैतिक और कानूनी दोनों रूप से पूरी तरह गलत है।
इस विषय को दो अलग-अलग दृष्टिकोण से समझा जा सकता है।अवैध वसूली (रिश्वत या जबरन पैसे मांगना) पूरी तरह बंद होना चाहिए। जब कोई परिवार अपने किसी प्रियजन को खो देता है, तब वे मानसिक रूप से बेहद कमजोर होते हैं। ऐसे समय में उनसे तय शुल्क से ज्यादा पैसे मांगना या बिना पैसों के काम न करने की धमकी देना अमानवीय है।कई मुक्तिधामों में कुछ बिचौलिए या कर्मचारी लकड़ी, कफन या दाह-संस्कार के नाम पर मनमानी रकम वसूलते हैं। इस तरह की अवैध वसूली पर सख्त कानूनी रोक लगनी चाहिए। आधिकारिक रख-रखाव शुल्क (सरकारी या ट्रस्ट की रसीद) पारदर्शी होना चाहिए। मुक्तिधाम की साफ-सफाई, बिजली, पानी और वहां काम करने वाले कर्मचारियों (जैसे सफाईकर्मी या डोम राजा) के वेतन के लिए एक न्यूनतम और आधिकारिक शुल्क जरूरी होता है। कई नगर निगम या सामाजिक संस्थाएं (NGOs) इसे पूरी तरह मुफ्त चलाती हैं। जहां शुल्क लिया भी जाता है, वहां सरकारी रसीद कटना अनिवार्य होना चाहिए ताकि लोगों को पता रहे कि उनका पैसा सही जगह जा रहा है।


