बिना थिएटर किए और एक्टिंग की ट्रेनिंग लिए जबरदस्त अभिनेता थे अशोक कुमार

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

जब भी भारतीय सिनेमा के इतिहास की बात होगी, एक नाम हमेशा सबसे ऊपर आयेगा और वो नाम है अशोक कुमार का, जिन्हें दुनिया ने प्यार से दादामुनि कहा।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि करोड़ों दिलों पर राज करने वाला यह सुपरस्टार कभी कैमरे के सामने आना ही नहीं चाहता था?
वह तो कलकत्ता से वकालत पढ़कर फिल्मों में सिर्फ डायरेक्टर बनने आए थे।

13 अक्टूबर 1911 को बिहार के भागलपुर में जन्मे कुमुदलाल गांगुली ने कलकत्ता से वकालत की थी।
वे फिल्मों के शौकीन जरूर थे, लेकिन उनका सपना कभी भी एक्टर बनने का नहीं, क्योंकि उनका मानना था कि फ़िल्मों में हीरोइन कॉल गर्ल बनती है और उनके दलाल एक्टर्स…इसलिए वो एक्टिंग से कोसों दूर रहना चाहते थे..
वो मुंबई डायरेक्टर बनने का सपना लेकर आए थे…
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, जो एक्टिंग से नफ़रत करते थे वही आगे जाकर हिंदी सिनेमा पहले सुपरस्टार बने..

साल 1930 के दशक में वे अपने बहनोई शशधर मुखर्जी के जरिए उस दौर के मशहूर प्रोडक्शन हाउस बॉम्बे टॉकीज पहुंचे और वहाँ उन्होंने स्टूडियो के मालिक हिमांशु राय के साथ बतौर लैब टेक्नीशियन काम करने लगे..और बाद में असिस्टेंट डायरेक्टर बन गए और उनका काम सेट पर एक्टर्स को उनके सीन समझाना था..

बॉम्बे टॉकीज में बतौर लैब असिस्टेंट की नौकरी करने वाले कुमुदलाल को नियति ने एक ही झटके में कैमरे के पीछे से लाकर कैमरे के सामने खड़ा कर दिया…

दरअसल साल 1936 में बॉम्बे टॉकीज की फिल्म जीवन नैया की शूटिंग चल रही थी। फिल्म के लीड एक्टर थे नजमुल हसन और हीरोइन थीं हिमांशु राय की पत्नी देविका रानी।

शूटिंग के दौरान नजमुल हसन और देविका रानी के बीच नजदीकियां बढ़ीं और दोनों अचानक सेट से भागकर कोलकाता चले गए।
हिमांशु राय को जब यह पता चला, तो वे बहुत परेशान हो गए। बाद में शशधर मुखर्जी के समझाने पर देविका रानी तो वापस लौट आईं, लेकिन नजमुल हसन को फिल्म से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

अब फिल्म बीच में अटक गई और हिमांशु राय की नजर लैब असिस्टेंट का काम कर रहे कुमुदलाल पर पड़ी,
उन्होंने उनसे हीरो बनने को कहा लेकिन कुमुदलाल हीरों नहीं बनना चाहते थे, तब हिमांशु राय ने उन्हें भरोसा दिलाया कि बॉम्बे टॉकीज में सिर्फ शिक्षित और अच्छे परिवारों के लोग ही काम करते हैं।
आखिरकार वे माने और उनका नाम बदलकर रखा गया अशोक कुमार…

अपनी पहली ही फिल्म जीवन नैया में उन्होंने न सिर्फ एक्टिंग की, बल्कि उस दौर में जब प्लेबैक सिंगिंग नहीं होती थी और हीरो को ही अपने गाना पड़ता था तब अशोक कुमार ने खुद अपनी आवाज में गाना गाया था..

कोई हमदम न रहा, कोई सहारा न रहा…

पढ़कर चौंक गए ना.. चौंकना लाज़िमी है, क्योंकि हम सब तो ये गाना किशोर कुमार का समझते हैं..
जी हाँ, ये गाना सबसे पहले दादामुनि ने ही अपनी पहली फ़िल्म में गाया था..

चूँकि उनके छोटे भाई किशोर कुमार अपने बड़े भाई दादामुनि से बेहद प्यार करते थे और उनका सम्मान करते थे। जब किशोर दा ने 1961 में फिल्म झुमरू बनाई, तो उन्होंने अपने भाई के इसी पहले गाने को अपनी आवाज में गाकर उन्हें एक शानदार और ट्रिब्यूट दिया था…

जैसे ही खंडवा में उनके घर पर ये खबर पहुंची कि कुमुदलाल फिल्मों में हीरो बन गए हैं, तो उनके परिवार में भूचाल आ गया।
एक्टिंग के पेशे से नाराज लड़की वालों ने अशोक कुमार का तय हो चुका रिश्ता तुरंत तोड़ दिया और उनके पिता कुंजलाल गांगुली तो इतने परेशान हुए कि वे सीधे नागपुर भागे और अपने दोस्त व दिग्गज कांग्रेसी नेता पं. रविशंकर शुक्ल जो बाद में वहां के सीएम बने,से मिलकर इनकम टैक्स विभाग में नौकरी का ऑफर लाए थे..

पिता नागपुर से सीधे बॉम्बे टॉकीज पहुंचे और हिमांशु राय से कहा, “मेरा बेटा नौकरी करेगा, फिल्में नहीं!”

हिमांशु राय उनकी बात सुनकर उन्हें अपने केबिन में ले गए। राय ने उनके पिता को अशोक कुमार का काम और स्टूडियो का माहौल दिखाया। दोनों के बीच अकेले में क्या बात हुई यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन केबिन से बाहर आते ही पिता ने खुद सरकारी नौकरी के कागज़ फाड़ दिए और कहा,
“मेरा बेटा फिल्मों में ही रहेगा और एक दिन बहुत ऊंचे मुकाम पर पहुंचेगा।”

ये बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि
जब अशोक कुमार पहली बार अपनी होने वाली पत्नी शोभा देवी को देखने गए थे, तब वे खुद 18 साल के थे और शोभा सिर्फ 8 साल की बच्ची थीं।
उस मुलाकात में उन्होंने उस छोटी सी लड़की को बहुत तेजी से चूल्हे पर 50 रोटियां बनाते देखा था, जिससे वे काफी प्रभावित हुए थे।
साल 1936 में जब वे फिल्मों में आ चुके थे, तब उनके पिता ने उन्हें अचानक खंडवा बुलाया और बिना कुछ बताए सीधे कलकत्ता ले जाकर शोभा देवी से उनकी शादी करवा दी। तब शोभा देवी 15 वर्ष की थीं और अशोक कुमार 25 के हो चुके थे।

अशोक कुमार ने कभी किसी थिएटर में काम नहीं किया था और न ही एक्टिंग की कोई ट्रेनिंग ली थी। उस जमाने में पारसी थिएटर का लाउड प्रभाव था, जहाँ एक्टर्स बहुत चीख-चिल्लाकर और हाथ हवा में लहराकर बोलते थे। अशोक कुमार ने हॉलीवुड अभिनेता हम्प्रि बोगार्ट जैसे विदेशी कलाकारों की फिल्में देखीं और अपनी समझ से एकदम नेचुरल एक्टिंग की शुरुआत की, वे पर्दे पर ऐसे संवाद बोलते थे जैसे कोई आम इंसान घर में बात कर रहा हो।

अशोक कुमार का स्टारडम उस दौर में कितना खतरनाक था, इसका एक मजेदार उदाहरण राज कपूर की शादी में देखने को मिला।

राज कपूर और कृष्णा मल्होत्रा की शादी हो रही थी। जैसे ही अशोक कुमार स्टेज पर दूल्हा-दुल्हन को बधाई देने पहुंचे,
दुल्हन कृष्णा जी ने दादामुनि को सामने देखकर अपनी खुशी रोक नहीं पाईं। उन्होंने तुरंत अपना घूंघट उठाया और उत्साह में चिल्ला उठीं,

“ओह! ये तो अशोक कुमार हैं! मैं कितनी खुश हूँ!”

बेचारे राज कपूर अपनी ही शादी में कुछ पलों के लिए साइडलाइन हो गए।
कहा जाता है कि राज कपूर इस बात के लिए अशोक कुमार को लंबे समय तक मजाकिया लहजे में कोसते रहे कि उन्होंने उनकी शादी की सारी लाइमलाइट चुरा ली थी।

हिंदी फिल्मों में सबसे पहले पर्दे पर एंटी-हीरो का रोल निभाने का श्रेय अशोक कुमार को ही जाता है, जो उन्होंने 1943 में ज्ञान मुखर्जी की फिल्म किस्मत में निभाया था।

साल 1943 में आई उनकी इस फिल्म ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। यह भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म थी जिसने 1 करोड़ रुपये की कमाई की थी और कोलकाता के एक थिएटर में यह फिल्म लगातार 3 साल से ज्यादा समय तक चलती रही थी।

साल 1940 में हिंमाशु राय के निधन के बाद अशोक कुमार ने बॉम्बे टॉकीज की कमान संभाली और स्टूडियो के सर्वेसर्वा रहते हुए उन्होंने देव आनंद, राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कई नए चेहरों को तराशा और उन्हें पहला बड़ा ब्रेक दिया..

कैमरे के पीछे की समझ के कारण वे कमाल के स्क्रीनप्ले और एडिटिंग पारखी थे। साल 1949 में उन्होंने भारत की पहली सस्पेंस-हॉरर फिल्म महल बनाई
इस फिल्म के लिए उन्होंने उस वक्त की नई अभिनेत्री मधुबाला को लीड रोल के लिए चुना। फिल्म ब्लॉकबस्टर रही और मधुबाला रातों-रात सुपरस्टार बन गईं।

इसी फिल्म का का सदाबहार गाना था “आएगा आने वाला…अशोक कुमार ने इस गाने के लिए उस वक्त की नई गायिका लता मंगेशकर की आवाज को चुना, जिसने लता जी को हमेशा के लिए अमर बना दिया।

ढलती उम्र के साथ उन्होंने हीरो के रोल छोड़कर कड़क पिता, दादा और जज जैसे गंभीर किरदार अपनाए। साल 1968 में आई फिल्म आशीर्वाद में उनके अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
इसी फिल्म में उन्होंने भारतीय सिनेमा का पहला रैप जैसा गाना रेल गाड़ी रेल गाड़ी… गाया, जो बच्चों से लेकर बड़ों तक बेहद लोकप्रिय हुआ।

1980 के दशक में जब दूरदर्शन पर भारत का पहला सोप ओपेरा हम लोग प्रसारित हुआ, तो अशोक कुमार इसके सूत्रधार बने। उनके बात करने का अनूठा अंदाज हर घर की पसंद बन गया।

सिनेमा में उनके इसी योगदान के लिए उन्हें दादासाहब फाल्के पुरस्कार और पद्म भूषण पुरस्कार भी मिला।

13 अक्टूबर 1987 को उनके 76वें जन्मदिन पर उनके छोटे भाई किशोर कुमार का अचानक निधन हो गया। वे बड़े भाई के घर जन्मदिन मनाने ही आ रहे थे।
इस सदमे से दादामुनि ऐसे टूटे कि उन्होंने जीवनभर अपना जन्मदिन न मनाने की कसम खा ली।

आखिरकार, 10 दिसंबर 2001 को 90 वर्ष की आयु में इस महानायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया..

#bollywood #films