
शिक्षक दिवस विशेष
छात्रों का भविष्य संवारने में समर्पित किया जीवन
जितेंद्र जैन ‘जीतू’
राजनांदगाँव/बांधाबाजार। “हौसले बुलंद हों तो राह का हर पत्थर सीढ़ी बन जाता है”—इस कहावत को दुर्ग जिले के ग्राम निकुम निवासी महेश्वर कुमार गौतम ने सच कर दिखाया है। बचपन में गंभीर पोलियो के हमले के कारण 90% शारीरिक दिव्यांगता का शिकार होने के बावजूद महेश्वर ने अपनी शारीरिक सीमाओं को कभी सपनों के आड़े नहीं आने दिया। आज वे शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बांधाबाजार में सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थ हैं और विषम परिस्थितियों में भी पहाड़ी पर स्थित स्कूल पहुंचकर विद्यार्थियों का भविष्य संवार रहे हैं।
महेश्वर जब महज दो वर्ष के थे, तभी पोलियो की चपेट में आने से उनका 90% शरीर अशक्त हो गया था। गांव के स्कूल में प्रारंभिक पढ़ाई के दौरान सहपाठी उन्हें साइकिल पर बैठाकर स्कूल ले जाया करते थे। जब वे 11वीं कक्षा में थे, तभी पिता का साया सिर से उठ गया। घोर आर्थिक तंगी के उस दौर में बड़े भाई ने मजदूरी कर उनकी पढ़ाई जारी रखवाई। 10वीं और 12वीं (गणित संकाय) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने स्वाध्यायी छात्र के रूप में बी.कॉम और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया। वर्ष 2008-09 में डाइट बेमेतरा से डी.एड. पूरा करने के बाद 2010 में वे पंचायत सहायक शिक्षक (विज्ञान) के रूप में नियुक्त हुए।
महेश्वर वर्तमान में बांधाबाजार में ही किराए के मकान में रहते हैं। उनका विद्यालय एक दुर्गम पहाड़ी पर स्थित है, जहां तक पहुंचना एक सामान्य व्यक्ति के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। भारी शारीरिक कष्ट झेलने के बावजूद वे रोज समय पर विद्यालय पहुंचते हैं और पूरे मनोयोग से शिक्षण कार्य करते हैं।
बहुआयामी शिक्षण और जरूरतमंदों की मदद
डेढ़ दशक के सेवाकाल में उन्होंने केवल विज्ञान ही नहीं, बल्कि गणित, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और व्यावसायिक अध्ययन जैसे विषयों का भी प्रभावी अध्यापन कराया है। शिक्षण के साथ-साथ वे अपनी सीमित आय से जरूरतमंद बच्चों की फीस, किताबें और अन्य जरूरतों के लिए नियमित आर्थिक सहयोग भी देते हैं।
व्यवस्था की अनदेखी, मगर दिलों पर राज
शिक्षक दिवस पर महेश्वर कुमार गौतम की यह जीवन-यात्रा समाज और भावी पीढ़ी के लिए एक सशक्त प्रेरणा है। विडंबना यह है कि जमीनी स्तर पर निःस्वार्थ सेवा देने वाले ऐसे कर्मठ शिक्षक अक्सर शासकीय पुरस्कारों और सम्मानों की सूची से छूट जाते हैं। प्रशासनिक व राजनीतिक पहुंच के अभाव में वे औपचारिक सम्मान भले न पा सकें, लेकिन अपनी निष्ठा और समर्पण के दम पर वे विद्यार्थियों और समाज के दिलों पर राज कर रहे हैं।


