
जन्मजयंती पर नमन कैप्टन
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
शेरशाह आ गया है, पीछे हटो!”
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान यह पाकिस्तानी सेना के वायरलेस सेट पर गूंजता हुआ खौफ था। यह खौफ पैदा करने वाले थे 13 JAK RIF के कैप्टन विक्रम बत्रा।
“ये दिल मांगे मोर” का नारा बुलंद करने वाले विक्रम बत्रा को पूरी दुनिया एक निडर सैनिक के रूप में जानती है, लेकिन आज उनके जन्मदिन के इस विशेष मौके पर हम आपको उनके जीवन के उन पन्नों पर ले चलेंगे, जो इतिहास की किताबों में अक्सर छूट जाते हैं।
आइए जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी 5 अनसुनी और दिल छू लेने वाली बातें।
एक ही नहीं, दो शेरशाह पैदा हुए थे यानी जुड़वां भाइयों का अनोखा रिश्ता
बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में गिरधारी लाल बत्रा और कमल कांता बत्रा के घर सिर्फ एक नहीं, बल्कि दो जुड़वां बेटों ने जन्म लिया था।
माता-पिता ने रामायण से प्रेरित होकर उनका घर का नाम लव (विक्रम) और कुश (विशाल) रखा था…दोनों भाइयों की शक्लें आपस में इतनी मिलती थीं कि बचपन में स्कूल के शिक्षक भी धोखा खा जाते थे।
यहाँ तक कि एक बार कारगिल युद्ध के दौरान, जब विशाल अपने भाई विक्रम से मिलने बेस कैंप जाने वाले थे, तो सुरक्षा कारणों से उन्हें रोक दिया गया क्योंकि वे बिल्कुल विक्रम जैसे दिखते थे और दुश्मन भ्रमित हो सकता था।
मर्चेंट नेवी की लाखों की नौकरी को मार दी थी लात-
अक्सर माना जाता है कि विक्रम बत्रा का ध्यान हमेशा से सिर्फ सेना पर था, लेकिन कॉलेज के दिनों में उन्हें एक और बड़ा अवसर मिला था।
चंडीगढ़ से पढ़ाई के दौरान ही विक्रम का चयन हॉन्गकॉन्ग की एक बड़ी मर्चेंट नेवी कंपनी में हो गया था। उस ज़माने में वहां उन्हें लाखों रुपये का सैलरी पैकेज मिल रहा था, जो एक आम युवा के लिए सपना होता है।
उन्होंने जॉइनिंग की तैयारी भी कर ली थी और उनके सूट भी सिल चुके थे, लेकिन ऐन वक्त पर विक्रम का दिल बदल गया।
उन्होंने अपनी मां से कहा,
“मां, मुझे पैसा नहीं कमाना, मुझे देश के लिए कुछ बड़ा करना है।”
इसके तुरंत बाद उन्होंने मर्चेंट नेवी का ऑफर ठुकरा दिया और सीडीएस की तैयारी में जुट गए।
खून से भरी थी डिंपल की मांग-
जब विक्रम सेना में थे, तो डिंपल के परिवार वाले उन पर शादी का दबाव बना रहे थे। एक बार जब विक्रम चंडीगढ़ के मनसा देवी मंदिर में डिंपल से मिलने आए, तो डिंपल ने अपनी चिंता जाहिर की।
तब विक्रम ने बिना कुछ सोचे तुरंत अपनी जेब से एक ब्लेड निकाला, अपने हाथ का अंगूठा काटा और अपने खून से डिंपल की मांग भर दी।
उन्होंने डिंपल से कहा, “अब तुम मेरी हो।”
और ये कोई फिल्मी सीन नहीं था, बल्कि देश के एक जांबाज सिपाही का अपनी मोहब्बत के प्रति अटूट समर्पण था।
आखिरी फोन कॉल और वो अधूरी कसम-
शहीद होने से कुछ दिन पहले, कैप्टन विक्रम बत्रा ने सैटेलाइट फोन के जरिए अपने जुड़वां भाई विशाल बत्रा से बात की थी।
विशाल ने जब उनसे कहा कि अपनी ध्यान रखना, तो विक्रम ने हंसते हुए कहा था,
“फिक्र मत कर भाई, मैं या तो तिरंगा लहराकर आऊंगा, या तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, लेकिन आऊंगा जरूर।”
उसी कॉल पर उन्होंने विशाल से ये भी कहा था कि कारगिल से वापस आते ही वे और डिंपल शादी के बंधन में बंध जाएंगे। दुर्भाग्य से, वह शादी की कसम अधूरी रह गई,
लेकिन तिरंगे वाली बात उन्होंने सच कर दिखाई।
जब दुश्मन कमांडर भी उनकी बहादुरी का कायल हो गया-
कारगिल युद्ध के दौरान विक्रम बत्रा का कोड नेम शेरशाह था। पाकिस्तानी सेना उनके नाम से इस कदर खौफ खाती थी कि उनकी इंटरसेप्ट की गई रेडियो कॉल्स में पाकिस्तानी कमांडर अक्सर कहते थे, शेरशाह आ गया है, पीछे हटो।
पॉइंट 5140 की फतह के बाद, जब कैप्टन बत्रा पॉइंट 4875 को आजाद कराने पहुंचे, तो एक पाकिस्तानी स्नाइपर ने रेडियो पर उन्हें चुनौती देते हुए कहा था,
“शेरशाह, ऊपर मत आना, वरना मौत मिलेगी।”
विक्रम बत्रा ने जवाब दिया था, “देखते हैं किसमें कितना दम है।”
उनके अदम्य साहस को देखकर दुश्मन सेना के कई अधिकारी भी हैरान थे कि कोई मौत के इतने करीब आकर कैसे मुस्कुरा सकता है।
7 जुलाई 1999 को मात्र 24 साल की उम्र में कैप्टन विक्रम बत्रा अपने घायल साथी की जान बचाते हुए शहीद हो गए।
आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन 9 सितंबर का यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत माता ने एक ऐसे शेर को जन्म दिया था जिसने अपनी जवानी देश के नाम लिख दी।
कैप्टन विक्रम बत्रा, आपका नाम जब तक यह देश रहेगा, तब तक हर भारतीय के दिल में गर्व और सम्मान के साथ लिया जाएगा।
जन्मदिन मुबारक हो, भारत के असली शेरशाह!
जय हिंद, जय भारत!
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