
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
अजी रूठ कर अब कहाँ जाइएगा, जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा…”
ये सिर्फ एक सुपरहिट फिल्मी गाना नहीं है, बल्कि बॉलीवुड के सबसे हैंडसम और दिग्गज संगीतकार जयकिशन का लता मंगेशकर को मनाने का तरीका था!
दरअसल, फिल्म आरजू के गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान किसी बात को लेकर जयकिशन और स्वर कोकिला लता मंगेशकर के बीच मतभेद हो गया था, लता जी नाराज हो गईं और उन्होंने गाना गाने से मना कर दिया।
जयकिशन उन्हें मनाने उनके घर पहुंचे। जैसे ही लता जी ने दरवाजा खोला, तो जयकिशन मजाकियां अंदाज़ में घुटनों के बल बैठ गए और गुनगुनाने लगे.. “अजी रूठ कर अब कहाँ जाइएगा, जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा…”
ये देखकर लता जी अपनी हंसी नहीं रोक पाईं और गुस्सा थूक कर तुरंत रिकॉर्डिंग के लिए तैयार हो गईं।
जयकिशन ऐसे ही जिंदादिल और मस्तमौला इंसान थे, उनका पूरा नाम पूरा नाम जयकिशन दयाभाई पांचाल था।
बहुत कम लोग जानते हैं कि जयकिशन मुंबई संगीतकार बनने नहीं, बल्कि एक फिल्म एक्टर बनने आए थे। उनके नैन-नक्श और लुक किसी बड़े स्टार जैसे ही थे। मुंबई आने के बाद जब शुरुआत में उन्हें काम नहीं मिला तो गुजारे के लिए उन्होंने एक फैक्ट्री में टाइमकीपर की नौकरी भी की और साथ ही फिल्मों में काम की तलाश जारी रखी…
शंकर और जयकिशन की पहली 1940 के दशक के आखिरी सालों में हुई थी। जयकिशन और शंकर दोनों ही काम की तलाश में मुंबई के एक मशहूर गुजराती फिल्म डायरेक्टर चंद्रवदन भट्ट के दफ्तर के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बेंच पर बैठे-बैठे ही दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई।
बातों ही बातों में शंकर को पता चला कि जयकिशन बहुत बेहतरीन हारमोनियम बजाते हैं। शंकर खुद एक उस्ताद तबला वादक थे और उस समय वो पृथ्वी थिएटर्स से जुड़े थे और वहां 75 रुपये प्रति महीने पर तबला बजाते थे।
बातचीत के दौरान शंकर ने जयकिशन को बताया कि पृथ्वी थिएटर्स में इस समय एक हारमोनियम वादक की जरूरत है। शंकर ने जयकिशन को वहां ऑडिशन देने के लिए कहा और खुद उनकी सिफारिश भी कर दी।
जयकिशन को पृथ्वी थिएटर्स में नौकरी मिल गई। अब दोनों दोस्त पार्टनर बन चुके थे। वहां नाटकों के दौरान शंकर तबला बजाते और जयकिशन हारमोनियम संभालते। दोनों की यह जुगलबंदी इतनी मशहूर हुई कि पृथ्वीराज कपूर के बेटे राज कपूर की नजर इन पर पड़ी।
इसके बाद राज कपूर ने इन्हें अपनी पहली फिल्म आग में संगीतकार राम गांगुली के असिस्टेंट के रूप में काम दिया।
और जब राज कपूर अपनी अगली फिल्म बरसात बनाने लगे, तो उन्होंने इस फ़िल्म के संगीत का पूरा जिम्मा शंकर को सौंपना चाहा। लेकिन शंकर ने साफ कह दिया कि वे अकेले नहीं, बल्कि अपने दोस्त जयकिशन के साथ बराबरी के पार्टनर के रूप में ही काम करेंगे।
राज कपूर मान गए और इस तरह एक ऑफिस के बाहर शुरू हुई दोस्ती बॉलीवुड की सबसे महान संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन बन गई।
जयकिशन दिखने में जितने सीधे और मजाकिया थे, अपने काम को लेकर उतने ही पक्के और स्वाभिमानी थे।
फिल्म संगम के एक गाने की धुन को लेकर शोमैन राज कपूर और जयकिशन के बीच स्टूडियो में जबरदस्त बहस हो गई….
राज कपूर अपनी बात पर अड़े थे और जयकिशन अपनी धुन को लेकर आश्वस्त थे। बहस इतनी बढ़ गई कि गुस्से में आकर जयकिशन ने राज कपूर की शर्ट का कॉलर पकड़कर खींच दिया, जिससे उनकी शर्ट फट गई थी…
पूरे स्टूडियो में सन्नाटा पसर गया क्योंकि राज कपूर उस समय फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े शोमैन थे…
लेकिन कुछ ही मिनटों बाद दोनों हंस पड़े और फिर जयकिशन की धुन पर ही गाना रिकॉर्ड हुआ वो गाना था “दोस्त दोस्त ना रहा…जिसे महान गायक मुकेश ने अपनी आवाज दी थी,
शम्मी कपूर की फिल्म जंगली का वो मशहूर गाना तो आपने सुना ही होगा….याहू! चाहे कोई मुझे जंगली कहे”…
लोग सोचते हैं कि गाने के बीच में आने वाली वो कड़क याहू की आवाज मोहम्मद रफी या शम्मी कपूर की है।
लेकिन सच यह है कि जयकिशन रफी साहब के गले पर ज्यादा जोर नहीं डालना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने लेखक दोस्त प्रयाग राज को स्टूडियो बुलाया और उनसे वो चीख लगवाई थी।
जयकिशन उस दौर के सबसे स्टाइलिश संगीतकार थे। हमेशा महंगे सूट पहनना, चमचमाते जूते और माथे पर लहराती बालों की जुल्फें उनकी पहचान थीं। लड़कियां उनकी दीवानी थीं।
उस जमाने में यह अफवाह इतनी फैल गई थी कि लोग कहने लगे थे कि जयकिशन ने अपने बालों का लाखों रुपये का इंश्योरेंस करवा रखा है। हालांकि यह सिर्फ एक गॉसिप थी, लेकिन इससे उनके स्टारडम का अंदाजा लगाया जा सकता है।
शंकर और जयकिशन की जोड़ी उस दौर में बहुत मशहूर थी, इस जोड़ी ने 170 से भी अधिक फिल्मों में संगीत दिया।
लेकिन सिर्फ एक बात ने इस जोड़ी के बीच दरार ला दी,
शंकर और जयकिशन के बीच एक पक्का नियम था कि वे दुनिया के सामने कभी नहीं बताएंगे कि कौन सा गाना किसने अकेले बनाया है। सब कुछ शंकर-जयकिशन के नाम से ही जाएगा।
लेकिन एक बार जयकिशन ने फिल्मफेयर मैगजीन के इंटरव्यू में कह दिया था कि फिल्म संगम का गाना “ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर…” उन्होंने अकेले बनाया था।
इस बात से शंकर बहुत नाराज हुए और यहीं से इस सुपरहिट जोड़ी के बीच दूरियां आनी शुरू हो गईं।
लेकिन इस जोड़ी के बीच प्यार और सम्मान कभी कम नहीं हुआ था इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि जब 1972 में जब फिल्म बेईमान के लिए इस जोड़ी को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला, तो फिल्म इंडस्ट्री में विवाद हो गया था।
संगीत के जानकारों का मानना था कि यह अवॉर्ड फिल्म पाकीज़ा के संगीतकार गुलाम मोहम्मद को मिलना चाहिए था।
चूँकि जयकिशन का निधन 1971 में ही हो चुका था, उनके जाने के बाद जब यह ट्रॉफी घर आई, तो शंकर ने विरोध और दुख जताने के लिए उस चमचमाती ट्रॉफी पर एक काला तौलिया लपेटकर उसे अलमारी के पीछे छुपा दिया था।
जयकिशन को आलीशान जिंदगी और पार्टियों का बहुत शौक था, जिसके चक्कर में उन्हें शराब की गंभीर लत लग गई।
इसी वजह से उन्हें लिवर सिरोसिस हो गया। और मात्र 41 साल की उम्र में, आज ही के दिन यानी 12 सितंबर 1971 को इस महान संगीतकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
जयकिशन को विशेष रूप से शानदार बैकग्राउंड स्कोर तैयार करने और बेहद खूबसूरत रोमांटिक व सदाबहार धुनें बनाने के लिए जाना जाता था। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा का बेहतरीन फ्यूजन पेश करके फिल्म संगीत का अंदाज ही बदल दिया…
उनके संगीत से सजे कुछ प्रसिद्ध गानों में जिया बेकरार है, हवा में उड़ता जाए, प्यार हुआ इकरार हुआ, रमैया वस्तावैया और आवारा हूँ जैसे अनगिनत नाम शामिल हैं
आपको उनका कौन सा गाना पसंद है..?
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