दो दोस्त एक शो-मैन, एक ट्रेजडी-किंग

ये कहानी ऐसे दो लड़कों की है जो एक ही शहर की तंग गलियों में पैदा हुए, एक ही कॉलेज में पढ़े, एक ही समय पर देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बने और जब विदा हुए, तो सिनेमा का एक पूरा स्वर्णिम युग अपने साथ ले गए।

आइए जानते है कि शोमैन राजकपूर और ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार की जिंदगी की कहानी एक दूसरे से कितनी मिलती है…❤️

कहानी की शुरुआत होती है अखंड भारत के पेशावर शहर से जो अब पाकिस्तान में है..
दोनों का जन्म पाकिस्तान के पेशावर शहर में हुआ था और दोनों के पुश्तैनी घर भी पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में बहुत पास-पास थे और किस्मत का खेल देखिए, जब दोनों के परिवार भारत विभाजन के बाद मुंबई आए, तो इन दोनों ने मुंबई के खालसा कॉलेज से एक साथ पढ़ाई की…फिल्मों में आने से पहले ही, ये दोनों आम लड़कों की तरह कॉलेज के गलियारों में साथ घूमा करते थे और पक्के दोस्त बन चुके थे।

आगे चलकर दोनों ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा तो राज कपूर द ग्रेट शोमैन बन गए और उधार दिलीप कुमार भी अपनी एक्टिंग के दम पर ट्रैजेडी किंग कहलाए…

दोनों अपने दौर के सबसे बड़े Rivals थे, अपने पूरे करियर में उन्होंने केवल एक ही फिल्म में साथ काम किया। वह फिल्म थी 1949 में आई महबूब खान की अंदाज़.. इस फिल्म में उनके साथ नर्गिस भी मुख्य भूमिका में थीं और ये उस समय की ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई थी। इसके बाद पूरे सिनेमाई इतिहास में कोई दूसरा डायरेक्टर ऐसा नहीं हुआ जो इन दोनों को एक फ्रेम में साथ ला सके।

हालांकि बाद में राज कपूर अपनी दो बड़ी फिल्मों आवारा और संगम में दिलीप कुमार को कास्ट करना चाहते थे…
लेकिन संगम के समय दिलीप कुमार ने राज कपूर के सामने एक शर्त रख दी थी कि या तो राज कपूर इस फिल्म में सिर्फ एक्टिंग करें या सिर्फ डायरेक्शन, दोनों एक साथ न करें।
राज कपूर इस बात पर सहमत नहीं हुए, जिसके कारण दिलीप कुमार ने फिल्म ठुकरा दी।
दिलीप कुमार ने आरके बैनर की फिल्में कभी नहीं की थीं..और ना ही उन्होंने कभी आरके स्टूडियो में शूटिंग की सिवाय क्रांति के अलावा..

दरअसल दिलीप कुमार का ये नियम था कि वे अपनी निजी दोस्ती और प्रोफेशन को कभी मिक्स नहीं करते थे। उनका मानना था कि अगर वे अपने दोस्त राज कपूर के स्टूडियो में जाकर काम करेंगे, तो पेशेवर रिश्ते और निजी दोस्ती के बीच की सीमाएं धुंधली हो सकती हैं…
वे बस राज कपूर के बुलावे पर आरके स्टूडियो की मशहूर होली पार्टियों और ईद मिलन की दावतों में हमेशा शामिल होते थे।

इन दोनों दोस्तों का रुतबा सिर्फ भारत तक ही नहीं था, बल्कि सात समंदर पार तक फैला था:

हॉलीवुड के ऑस्कर विजेता निर्देशक डेविड लीन ने दिलीप कुमार को अपनी मशहूर फिल्म लॉरेंस ऑफ अरेबिया में एक रोल ऑफर किया था। लेकिन दिलीप कुमार ने हॉलीवुड जाने से मना कर दिया और बाद में वह रोल मिस्र के अभिनेता उमर शरीफ ने निभाया।

राज कपूर की फिल्म फिल्म आवारा को 1953 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में ग्रैंड प्राइज के लिए नामांकित किया गया था। वह रूस में इतने लोकप्रिय थे कि वहां के लोग उन्हें अपना नेशनल हीरो मानते थे।

साल 1988 में राज कपूर अस्पताल में वेंटिलेटर पर अपनी आखिरी सांसें गिन रहे थे और गहरे कोमा में थे। जब ये खबर दिलीप कुमार को मिली, तो वे सब कुछ छोड़कर आईसीयू पहुंचे।

दिलीप कुमार ने बेहोश पड़े राज कपूर का हाथ पकड़कर रोते हुए कहा

“राज, आज भी मैं देर से आया, मुझे माफ कर दे। तू तो हमेशा लाइमलाइट में रहना चाहता है, अब बहुत हुआ। उठ और मेरी बात सुन। मैं अभी पेशावर से आया हूँ और तेरे लिए वहाँ के चपली कबाब की खुशबू लाया हूँ। हम दोनों फिर से साथ चलेंगे, बाजारों में घूमेंगे और कबाब-रोटी खाएंगे। राज, अब बस कर, एक्टिंग मत कर, मुझे पता है तू बहुत बड़ा एक्टर है…”

उसके कुछ ही समय बाद राज कपूर इस दुनिया को अलविदा कह गए।

आगे चलकर राज कपूर को 1987 में भारत का सर्वोच्च सिनेमा सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया था। जब राष्ट्रपति भवन में उन्हें यह पुरस्कार दिया जा रहा था, तब वे बहुत बीमार थे और तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन खुद मंच से उतरकर राज कपूर को यह अवॉर्ड देने आए थे।
और इसके ठीक 7 साल बाद, 1994 में दिलीप कुमार को भी इसी सम्मान से नवाजा गया।

दिलीप कुमार भारत के ऐसे इकलौते अभिनेता हैं जिन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज 1998 में दिया गया था। और दिलचस्प बात ये भी है कि राज कपूर के पुश्तैनी घर को भी पाकिस्तान सरकार ने नेशनल हैरिटेज घोषित किया हुआ है।

क्या आपने इन दोनों की फ़िल्म अंदाज़ देखी है..?

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश