‎नाड़ी चलते तक कुछ अर्जित कर लो, नहीं तो बाद में पछताओगे‎


‎ जैन मुनि समयप्रभ जी का चातुर्मासिक प्रवचन

‎राजनांदगांव। खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य समयप्रभ सागर जी ने कहा कि नाड़ी चलते तक कुछ अर्जित कर लो, नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा। संचय करना अच्छा है किंतु उसका उपयोग नहीं किया तो बाद में अफसोस रह जायेगा।
‎मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने फरमाया कि बुद्धिमान व्यक्ति तर्कवान हो सकता है लेकिन जब तक वह विनयवान नहीं होगा तब तक उसके बुद्धिमान होने का कोई मूल्य नहीं। उन्होंने कहा कि सत्य कहने में ही हमारा हित है। जितनी जरूरत है उतना ही संचय करें। अतिरिक्त को दान कर दें। दान करने से पुण्य बढ़ता है।
‎ मुनि श्री ने कहा कि साधना का मार्ग कठिन है किंतु उसका फल सबसे ज्यादा मीठा है। आपको स्वयं अपनी आसक्ति छोड़ने के लिए मेहनत करनी होगी। मोह का त्याग जरूरी है। जिन्होंने जीवन भर संचय किया है और उसका उपयोग नहीं किया तो अंतिम समय में उसके पास पछताने के सिवाय और कुछ नहीं होगा।
‎ मुनि श्री समयप्रभ ने कहा कि ऐसा युग आ गया है कि बेटे अपने माँ-बाप को पालने से कतराने लगे हैं। एक आप अपने पांच बेटों को तो पाल सकता है लेकिन पांच बेटे मिलकर भी मां-बाप को नहीं पाल पाते! हम जीवों को दुखीकर चाहे मासखमन भी पूरा कर लें वह फायदा नहीं पा सकते जो कि हमें मिलता। आवश्यकता की सीमा होती है । सीमा से बाहर जाने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए। कोई भी चीज करो तो एक निश्चित सीमा तक ही करो और दान-धर्म-आराधना पर भी ध्यान दो।