भूख-प्यास से तड़पकर दम तोड़ती गायें; दिखावटी गोसेवा, कथा-प्रवचनों का पाखंड, फ्लॉप ‘गोकुल नगर’ और जब्ती के बाद कागजों में दफन कानूनी प्रक्रिया की जमीनी पड़ताल
जितेंद्र जैन जीतू
राजनांदगांव। संस्कारधानी के नाम से विख्यात राजनांदगांव में इन दिनों मूक मवेशियों की स्थिति “एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई” जैसी बन चुकी है। नगर निगम द्वारा संचालित कांजी हाउस अब पशु संरक्षण केंद्र कम और ‘यातना गृह’ ज्यादा नजर आ रहा है। सड़कों से आवारा मवेशियों को पकड़कर क्षमता से कई गुना अधिक संख्या में ठूंस तो दिया जाता है, लेकिन वहां न तो उनके लिए पर्याप्त दाना-पानी का प्रबंध है और न ही सूखे चारे का। नतीजा यह कि भूख, प्यास, गंदगी और प्रशासनिक बदहाली के चलते हर रोज बेजुबान तिल-तिल कर दम तोड़ रहे हैं।
शहर में समाजसेवा का ढिंढोरा पीटने वाली संस्थाओं और ‘तमगाधारी’ रसूखदारों की चुप्पी इस विभीषिका को और उजागर करती है। किसी प्रसिद्ध कथावाचक या महाराज के आगमन पर शहर के यही तथाकथित समाज-प्रमुख दंडवत प्रणाम करने और फूलों की बारिश करने में सबसे आगे रहते हैं। विशाल रथ, भव्य शोभायात्राएं, छप्पन भोग के निमंत्रण और लाखों की दक्षिणा लुटाने की होड़ मच जाती है—क्योंकि वहां राजनीतिक पहुंच, रसूख और स्वार्थ की रोटियां सिकती हैं।
इसके उलट, जिन मूक मवेशियों की सेवा से कोई आर्थिक या राजनीतिक लाभ नहीं मिलता, उनकी बदहाली और कांजी हाउस की बदइंतजामी पर इन धन्नासेठों ने पूरी तरह आंखें मूंद रखी हैं। ‘गोमाता’ के नाम पर चंदा जुटाने और मंचों से भाषण देने वालों की संवेदनशीलता कांजी हाउस की चहारदीवारी के बाहर ही दम तोड़ देती है।
शहर को आवारा मवेशियों और भीतरी खटालों से मुक्त कराने के लिए पूर्व कलेक्टर गणेश शंकर मिश्रा के कार्यकाल में महत्वाकांक्षी ‘गोकुल नगर’ योजना तैयार की गई थी। मंशा साफ थी कि पशुपालकों को शहर से बाहर रियायती व मुफ्त जमीन तथा बुनियादी ढांचा मुहैया कराया जाए, ताकि वे वहीं व्यवस्थित होकर अपना दूध व्यवसाय चलाएं और शहर की सड़कें मवेशी-मुक्त रहें।
आज उस योजना का हश्र सबके सामने है। अधिकांश पशुपालकों ने रियायती जमीनें लीं, सरकारी मदद से पक्के मकान खड़े किए और आज वे उन मकानों में ऐशो-आराम से रह रहे हैं, जबकि उनके जानवर खूंटे से छूटकर सड़कों पर लावारिस भटक रहे हैं। आज पूरी संस्कारधानी अघोषित ‘गोकुल नगर’ में तब्दील हो चुकी है, जहां आए दिन सड़कों पर बैठे मवेशियों के कारण भीषण हादसे हो रहे हैं—जिनमें कभी बेजुबान पहियों तले कुचल जाते हैं, तो कभी निर्दोष राहगीर अकाल मौत के मुंह में समा जाते हैं।
शहर और आसपास के राष्ट्रीय राजमार्गों पर पुलिस व गोसेवकों द्वारा कट्टीपार (अवैध गो-तस्करी) के लिए ले जाई जा रही गायों से लदे ट्रकों को पकड़ने की खबरें अक्सर अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। “कट्टीपार जा रही 50 गायें बचाई गईं”—पढ़कर आम नागरिक राहत की सांस लेता है, लेकिन जमीनी हकीकत यहीं से उलझती है।
छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (PCA Act, 1960 की धारा 11), मोटर वाहन अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत जब्ती पंचनामा बनाकर वाहन चालक व तस्करों पर केस दर्ज होता है। तस्करी में प्रयुक्त वाहन को जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) के माध्यम से राजसात (जब्त/नीलाम) करने का प्रावधान है।
मौके पर पशु चिकित्सा अधिकारी को बुलाकर मवेशियों का स्वास्थ्य परीक्षण (MLC) कराना अनिवार्य है, ताकि अदालत में क्रूरता का साक्ष्य प्रस्तुत किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत जब्त पशुओं को किसी भी सूरत में आरोपियों को नहीं सौंपा जा सकता। इन्हें अंतरिम सुपुर्दगीनामा पर पंजीकृत गोशाला, पशु कल्याण संगठन, या स्थानीय कांजी हाउस को सौंपा जाना चाहिए। मवेशियों के दाना-पानी और इलाज का दैनिक खर्च न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेशानुसार तय होता है, जिसे बाद में दोषियों से वसूला जाता है।
कानूनन इतनी पुख्ता व्यवस्था होने के बावजूद हकीकत में भारी झोल है। थाने में कागजी खानापूर्ति और प्रेस नोट जारी होने के दो दिन बाद इस मामले में यदि किसी जिम्मेदार अधिकारी, या थानेदार से पूछा जाए कि कागजी जब्ती के बाद वे मवेशी वास्तव में किस हालत में हैं और कहां रखे गए हैं?
उनकी सुपुर्दगी लेने वाली संस्था के पास पर्याप्त चारा-पानी है या नहीं?
क्या सुपुर्दगी के बाद उनका दोबारा भौतिक सत्यापन हुआ?
तो जिम्मेदारों के पसीने छूट जाते हैं। नतीजा यह होता है कि तस्करी से छुड़ाए गए जानवर या तो देखरेख और चारे के अभाव में दम तोड़ देते हैं, या फिर कागजी सांठगांठ और निगरानी की कमी के चलते पिछले दरवाजे से दोबारा उसी अवैध धंधे के चक्रव्यूह में पहुंचा दिए जाते हैं। वहीं इस मामले में
नगर निगम का दस्ता केवल रस्म अदायगी के लिए सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाता है, कुल मिलाकर प्रशासनिक योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी हैं और तथाकथित गोसेवक सिर्फ तस्वीरें खिंचवाने तक सीमित हैं।
यजिला प्रशासन और शासन को इस मामले में कांजी हाउस की क्षमता, दाना-पानी और पशु चिकित्सा व्यवस्था की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए वहीं ‘गोकुल नगर’ के भूखंड आवंटनों का भौतिक सत्यापन कर नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जानी चाहिए, और थानों द्वारा जब्त मवेशियों की सुपुर्दगी का पारदर्शी रिकॉर्ड व ऑडिट सार्वजनिक किया जाना चाहिए। नहीं तो संस्कारधानी की सड़कों पर भूख, उपेक्षा और हादसों में मूक मवेशियों के तड़पकर मरने का यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा।


