
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
जब लता मंगेशकर जी से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि क्या उन्हें अपनी ज़िंदगी में कभी किसी चीज़ से डर लगा? तो उन्होंने एक बहुत ही हैरान करने वाली बात कही थी।
उन्होंने कहा था, “मुझे इस बात का डर कभी नहीं था कि मैं भूखी मर जाऊँगी। मुझे सबसे बड़ा डर इस बात का था कि कहीं लोग मेरी आवाज़ या गाने को सुनकर यह न कह दें कि इसमें कोई कमी है।”
यह कोई मामूली डर नहीं था। इसी एक डर और परफेक्शन की ज़िद ने लता जी को एक साधारण लड़की से स्वर कोकिला बना दिया। लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने के लिए उन्हें जो पहला थप्पड़ पड़ा, वो उनकी आवाज़ पर ही था।
यह बात तब की है जब लता जी स्टेज शो करती थीं और उन्हें कुछ रिकॉर्डिंग के ऑफर भी मिलने लगे थे।
तब एक रिकॉर्डिंग के दौरान एक पठान ने उनका गाना सुनकर उनकी सिफारिश मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर अली साहब से की।
तब ग़ुलाम साहब उन्हें उस दौर के सबसे बड़े प्रोड्यूसर शशधर मुखर्जी के पास लेकर गए थे। मुखर्जी साहब उस समय फिल्म शहीद बना रहे थे।
उन्होंने लता जी को गाते हुए सुना और गुलाम हैदर से कहा कि वो इस लड़की को काम नहीं दे सकते, इस लड़की की आवाज़ बहुत पतली है,
मुखर्जी साहब के इस रिजेक्शन ने लता जी के मन में उस डर को और पक्का कर दिया कि उन्हें अपनी आवाज़ पर और मेहनत करनी होगी।
हालाँकि, गुलाम हैदर को उन पर पूरा भरोसा था और उन्होंने मुखर्जी साहब से कहा था, “आज आप इसे मना कर रहे हैं, लेकिन याद रखिए कि आने वाले वक्त में प्रोड्यूसर्स इस लड़की के पैरों में गिरेंगे।”
इसके बाद गुलाम साहब ने ही लता जी को फ़िल्म मजबूर के एक गाने से मौक़ा दिलाया था और इसके बाद लता जी को कभी काम की कमी नहीं हुई।
लता जी का ये डर कि उनकी आवाज़ कभी खराब न हो, साल 1962 में एक हकीकत बनने के करीब पहुँच गया था। जब वो सफलता के पीक पर थीं, अचानक उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। डॉक्टरों ने जांच की तो एक खौफनाक सच सामने आया कि उन्हें खाने में बहुत ही धीमा जहर दिया जा रहा था।
जैसे ही यह बात सामने आई, उनके घर का कुक बिना किसी को बताए, अपनी बची हुई सैलरी छोड़कर घर से भाग गया।
लता जी कई महीनों तक बिस्तर पर रहीं और डॉक्टरों को डर था कि शायद इस ज़हर के असर से उनकी आवाज़ हमेशा के लिए चली जाएगी। लेकिन अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और लंबे इलाज के बाद वह पूरी तरह ठीक हुईं।
ठीक होने के बाद उन्होंने जो पहला गाना गाया, वो था
“कहीं दीप जले कहीं दिल…”
लता जी के अविवाहित रहने को लेकर हमेशा चर्चा होती रही है। इसके पीछे दो बड़े कारण थे..
पिता के जाने के बाद लता जी का पूरा जीवन भाई-बहनों को पैरों पर खड़ा करने में बीत गया। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब तक भाई-बहन सेटल हुए, तब तक उनकी शादी की उम्र निकल चुकी थी।
दूसरा करण था डूंगरपुर के महाराजा राज सिंह से अधूरा प्यार।
राजघराने के इतिहास के अनुसार, लता जी और राजस्थान के डूंगरपुर रियासत के महाराजा राज सिंह एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। राज सिंह, लता जी के भाई हृदयनाथ के दोस्त थे। दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन उनकी फ़ैमिली राजघराने से अलग लड़की को बहू नहीं बनाना चाहती थी।
पिता के मान के लिए राज सिंह ने जीवनभर शादी नहीं की, और उनके इसी गहरे अहसास के सम्मान में लता जी ने भी किसी और का हाथ नहीं थामा। दोनों जीवनभर सबसे अच्छे दोस्त बनकर रहे।
लता मंगेशकर जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं
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