महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर ज़िले में आज, शुक्रवार को सुबह करीब 10 बजे, कुणाल मुरलीधर चंदगुडे का अपने पिता और मां से विवाद हो गया। कुणाल खावड्या पहाड़ी पर पहुँच गया और वहां से कूद कर आत्महत्या की धमकी देने लगा। माता पिता भी वहां पहुंचे।

उससे गुहार लगते रहे कि बेटा, मान जाओ और घर चलो।
बेटा था कि ज़िद पर अड़ा था।
लगभग तीन घंटे तक गाँव वाले, पुलिस, उसकी माँ और फायर ब्रिगेड के अधिकारी उससे गुहार लगाते रहे और साथ ही सुरक्षा के लिए जाल बिछाने की कोशिश करते रहे। आखिर में, शाम को जब वह कूदने लगा तो उसके पिता उसे पकड़ने के लिए लपके, लेकिन दोनों नीचे गिरे और उनकी मौत हो गई।
अपने बेटे और पति को खोने का असहनीय दृश्य देखकर माँ भी कुछ ही पल बाद, दुख और निराशा में नीचे कूद गई। सभी को मौके पर ही मृत घोषित कर दिया गया।
सोचिए… एक घर था।
एक बेटा था सिर्फ 19 साल का।
एक माँ थी, जो अपने बेटे को बचाने के लिए घंटों रोती रही।
एक पिता था, जिसने शायद आखिरी क्षण तक यही सोचा होगा कि मेरा बेटा बच जाए… चाहे मुझे कुछ भी हो जाए।
एक मामूली-से मोबाइल फोन को लेकर शुरू हुआ झगड़ा इतना भयानक मोड़ लेगा, किसी ने नहीं सोचा होगा।
यह सिर्फ एक दुखद दुर्घटना नहीं है। यह हम सबके लिए एक भयानक सवाल है।
क्या हम अपने बच्चों को यह सिखा रहे हैं कि गुस्सा आने पर रुकना भी जरूरी है?
क्या हम उन्हें बता रहे हैं कि कोई मोबाइल, कोई झगड़ा, कोई अपमान और कोई क्षणिक हार जिंदगी से बड़ी नहीं होती?
अपने बच्चों से बात कीजिए।
उन्हें सुनिए।
उन्हें यह यकीन दिलाइए – जो भी हो जाए… हम तुम्हारे साथ हैं। जिंदगी किसी भी मोबाइल, किसी भी झगड़े और किसी भी परेशानी से कहीं ज्यादा कीमती है।
डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, इंदौर


