‎परमात्मा की वाणी में जीवन का संपूर्ण सार है

श्रेयांशप्रभ ज़ी का जैन बगीचे में चातुर्मासिक प्रवचन


‎राजनांदगांव। “परमात्मा की वाणी में जीवन का संपूर्ण सार है। कल्पसूत्र मूल वाणी है। सर्वाधिक टीका यदि किसी में की गई है तो वह कल्पसूत्र है। किसी को सुनकर उनकी पूरी बातें तो नहीं कम से कम कुछ अंश तो ग्रहण करना ही चाहिए। पूर्व समय में साधु – साध्वियों को सुनकर ही ग्रहण करना पड़ता था, आज तो हम लिखकर भी याद कर सकते हैं फिर हम क्यों नहीं इस जीवन के सार को ग्रहण करते हैं!” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य श्रेयांशप्रभ सागर जी ने आज जैन बगीचा स्थित नये हाल में संवत्सरी पर्व के तीसरे दिन अपने नियमित प्रवचन में व्यक्त किए।
‎ मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि बुरी बातों को सुनकर हम उसे और विस्तारित कर देते हैं और इसे जल्दी ग्रहण करते हैं किंतु अच्छी बातों को हम और छोटा कर देते हैं और इसे ग्रहण करने में हमें काफी मेहनत करनी पड़ती है। हमारे बहुत सारे ग्रंथों को जला दिया गया। यदि हमने इनका सम्मान किया होता तो आज हमारी सांस्कृतिक विरासत काफी मजबूत होती। जो है उसे ही हम संभालने की कोशिश करें। उन्होंने कहा कि परमात्मा की वाणी हमारे जीवन को तार देती है। इस वाणी में वह शक्ति है जो अतीत, वर्तमान एवं भविष्य में होने वाले पापों से हमें सुरक्षित रखती है।
‎ मुनि श्री श्रेयांशप्रभ जी ने कहा कि हम अलग-अलग भगवानों को देखकर मन बदलते रहते हैं। तीर्थंकर कभी नाम से नहीं पूजे जाते बल्कि गुणों से पूजे जाते हैं। हमें तारने वाला नाम नहीं बल्कि नाम के पीछे जो श्रद्धा है, वह है। भगवान महावीर स्वामी कहते हैं कि जो भी बोलना है या करना है उसे सोच समझकर बोलो या करो। भगवान आदिनाथ का कहना है कि पाप तो पाप है चाहे वह जानकर करो या अनजाने में। मुनि श्री ने कहा कि हमें पाप से बचना चाहिए और परमात्मा की वाणी को ग्रहण कर अपने जीवन को धन्य बनाना चाहिए। यह जानकारी मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने दी।