
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
आज भारतीय सिनेमा के दिग्गज फिल्ममेकर विधु विनोद चोपड़ा का जन्मदिन है।
उन्होंने 3 इडियट्स, परिंदा और 12थ फेल जैसी कई ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाई हैं, लेकिन उनके दिल के सबसे करीब और उनके जीवन की सबसे व्यक्तिगत फिल्म रही है शिकारा जो साल 2020
में आई थी…
यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि एक ऐसे बेटे की अपने आंसुओं से लिखी गई दास्तान थी, जिसकी माँ अपनी ही मातृभूमि से बेदखल कर दी गई थी।
उनका जन्म कश्मीर के श्रीनगर में हुआ था लेकिन ये 1970 के दशक के मध्य में फिल्म मेकिंग की पढ़ाई करने के लिए FTII, पुणे आ गए थे, जिसके बाद वो फिर कभी कश्मीर नहीं गए और मुंबई में ही बस गए…
लेकिन उनका परिवार और उनकी माँ शांति देवी कश्मीर के श्रीनगर में ही रहती थीं।
1989 के अंत में विधु विनोद चोपड़ा की माँ शांति देवी श्रीनगर से मुंबई आई थीं। तब वे अपने साथ सिर्फ़ एक छोटा सा सूटकेस लेकर अपने बेटे की फ़िल्म परिंदा का प्रीमियर देखने आई थीं।
लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि वे अपने घर को आखिरी बार देख रही हैं….उग्रवाद और कश्मीरी पंडितों के पलायन के चलते उनका पूरा परिवार विस्थापित हो गया।
उनका घर लूटा गया, उनके अपनों को खोना पड़ा.. कश्मीर के हालात इतने बिगड़ गए थे कि वे कभी वापस अपने घर नहीं लौट पाईं
और साल 2007 में निर्वासन में ही अपने घर वापस लौटने के इंतज़ार में ही उनका निधन हो गया।
अपनी माँ के गुज़ारने के बाद उनके दर्द को दुनिया के सामने लाने के लिए विधु ने साल 2008 से शिकारा की कहानी लिखनी शुरू की थी।
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया भी था कि फिल्म शिकारा वास्तव में उनकी अपनी कहानी है।
यह पूरी फिल्म मैंने अपनी मां के लिए बनाई है। साल 2007 में उनके निधन के बाद वो कभी कश्मीर वापस नहीं लौट पाईं थी.. फिल्म में जो भी दिखाया गया है, वो सब मेरी मां ने खुद झेला और अनुभव किया था…
फ़िल्म को ऑथेंटिक बनाने के लिए विधु ने जगती रिफ्यूजी कैम्प और अन्य कैंपों में रह रहे असली कश्मीरी पंडित शरणार्थियों को फिल्म में शामिल किया था, उन्होंने सोचा होगा कि जिसने पलायन का दर्द झेला ही नहीं वो दर्द बॉलीवुड के एक्टर पर्दे पर नहीं दिखा पाएंगे..
उन्होंने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में फ़िल्म को लेकर एक भावुक अपील भी थी कि
“साल 1990 में जब हमें कश्मीर छोड़ना पड़ा था, तब किसी ने हमारी आवाज नहीं उठाई थी। कृपया कम से कम अब तो इसके बारे में आवाज उठाइए…”
साल 2020 में जब शिकारा रिलीज हुई, तो तो सोशल मीडिया और थिएटर्स में कुछ विवाद खड़े हो गए थे।
उस समय एक कश्मीरी महिला का थिएटर में रोते हुए वीडियो वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि फ़िल्म मेकर्स कश्मीरी पंडितों के पलायन के इस गहरे दर्द और त्रासदी को दिखाकर बस पैसे कमाना चाहते हैं, इसीलिए उन्होंने पूरी हकीकत नहीं दिखाई है…
तब अपने ऊपर लगे इस तरह के आरोपों से आहत होकर विधु विनोद चोपड़ा ने देश के युवाओं को संबोधित करते हुए एक ओपन लेटर जारी किया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि
अगर मुझे सिर्फ पैसे ही कमाने होते, तो मैं मुन्नाभाई या 3 इडियट्स का सीक्वल बना लेता, न कि शिकारा।
मैं खुद इस त्रासदी से प्रभावित कश्मीरी हिंदू हूँ। मेरी माँ जो सिर्फ एक सूटकेस लेकर आई थीं, वे कभी वापस अपने घर नहीं लौट पाईं और इसी दुख में उनका मुंबई में ही देहांत हो गया…
शिकारा मेरी मां, मेरे सह-लेखक राहुल पंडिता और मेरी अपनी निजी सच्चाई है।
ये कश्मीरी पंडितों की कहानी है जिन्होंने इतना बड़ा आघात झेलने के बाद भी कभी हाथ में बंदूक नहीं उठाई और न ही नफरत फैलाई, बल्कि शिक्षा और मेहनत के दम पर खुद को फिर से खड़ा किया।
मेरा मकसद कश्मीरी पंडितों के उस दर्द को दुनिया के सामने लाना था जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता लेकिन बिना किसी नफरत या हिंसा के बीज बोए..
उन्होंने पत्र के अंत में लिखा था कि हिंसा से सिर्फ हिंसा ही जनमती है। मैंने नफरत की वजह से अपना घर तबाह होते देखा है।
मैं चाहता हूँ कि आपका भविष्य मेरे अतीत से बिल्कुल अलग और बेहतर हो।
शिकारा बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई थी, जो दर्द, त्रासदी विधु विनोद चोपड़ा ने इस फिल्म के जरिए दिखाई थी, ना जाने क्यों दर्शक उससे कनेक्ट नहीं हो पाए थे…
कारण क्या रहे ये तो दर्शक ही बता सकते हैं..खैर मेरी तरफ़ से
Happy Birthday, Vidhu Vinod Chopra
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