
1960 में हम हिन्दुस्तानी फ़िल्म में मात्र दो मिनट की छोटी-सी भूमिका से उन्होंने अपने अभिनय की शुरुआत की।
वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की आरती के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह पास नहीं हो सके। इसके बाद उन्हें कई बी-ग्रेड फ़िल्में मिली। इन महत्वहीन फ़िल्मों के बावजूद अपने अभिनय के जरिये उन्होंने सबका ध्यान आकर्षित किया।
सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में उन्हें साल 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म निशान में काम करने का मौका मिला। साल 1960 से लेकर 1968 तक वे फ़िल्म इण्डस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे।
फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वो उसे स्वीकार करते चले गये। इस बीच उन्होंने स्मगलर, पति-पत्नी, हुस्न और इश्क, बादल, नौनिहाल और गुनहगार जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।
साल 1968 में आई फ़िल्म शिकार में वो पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखायी दिये। ये फ़िल्म पूरी तरह धर्मेन्द्र पर केन्द्रित थी फिर भी वे धर्मेन्द्र जैसे अभिनेता की उपस्थिति में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिये उन्हें सहायक अभिनेता का फ़िल्मफेयर अवार्ड भी मिला।
वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म संघर्ष में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन उन्होंने अपनी छोटी-सी भूमिका के बावजूद दर्शकों की वाहवाही लूट ली।
इसके बाद आशीर्वाद, राजा और रंक, सत्यकाम और अनोखी रात जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी से दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वे फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे।
साल 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म खिलौना की ज़बरदस्त कामयाबी के बाद उन्होंने बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। और 1970 में ही आई फ़िल्म दस्तक में उनके लाजवाब अभिनय के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
साल 1972 में प्रदर्शित फ़िल्म कोशिश में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। फ़िल्म कोशिश में गूँगे की भूमिका निभाना किसी भी अभिनेता के लिये बहुत बड़ी चुनौती थी। बगैर संवाद बोले सिर्फ आँखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना उनके अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई एक्टर दोहरा पाये।
इन्होंने दिलीप कुमार के साथ संघर्ष में काम किया। फ़िल्म खिलौना ने इन्हें स्टार का दर्जा दिलाया। इसके बाद इनकी हिट फ़िल्म सीता और गीता और मनचली प्रदर्शित हुईं। 70 के दशक में उन्होने गुलज़ार जैसे दिग्दर्शक के साथ काम किया। उन्होने गुलज़ार के साथ कुल 9 फ़िल्में कीं
फ़िल्म शोले में उनके द्वारा निभाया गया किरदार आज भी लोगों के दिलों में ज़िन्दा है। जो मिमिक्री कलाकारों के लिये एक मसाला है।
क्या आप बता सकते हैं कि मैं किस अभिनेता की बात कर रही हूँ…?
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश


