‎धर्म की शरण लेने वाला कष्टों की परवाह नहीं करता

मुनि समयप्रभ जी का चातुर्मासिक प्रवचन

‎राजनांदगांव। “धर्म की शरण लेने वाला कभी कष्टों की परवाह नहीं करता। वह कष्टों से संघर्ष करता है और विजय प्राप्त करता है। सामान्य भिक्षु  ( साधु ) अनुकूलता को अपना मार्ग मानता है और वह इस मार्ग पर चलना चाहता है। वह सुविधा का उपभोग करना चाहता है!” उक्त उदगार खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य समयप्रभ सागर जी ने व्यक्त किए।
‎ मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने फरमाया कि धर्म की शरण लेने वाले साधु को अनुकूलता की कोई परवाह नहीं होती। वह अनुकूलता को अपनी पीठ दिखता है और प्रतिकूलता को अपनाता है। वह यह जानता है की अनुकूलता उसे धर्म से दिखा देगी और प्रतिकूलता उसे धर्म के मार्ग में अडिग बनाएगी।
‎ मुनिश्री ने कहा कि प्रतिकूलता को पकड़ने के लिए धीरज धारण करना पड़ता है, दुखों का सामना करना पड़ता है। भूख से व्याकुल होने के बावजूद एक साधु अनुकूलता को स्वीकार नहीं करता। उन्होंने कहा कि साधु के प्रति अहोभाव होना चाहिए। साधुओं को शाबाशी से कोई मतलब नहीं होता। वह केवल आत्म कल्याण के मार्ग में रमे रहता है। सम्यक ज्ञान वाला कभी घमंडी नहीं हो सकता और वह विनयवान होता है। छोटी-छोटी चीजों की ओर उसका ध्यान ही नहीं होता, उसका लक्ष्य तो सिर्फ मोक्ष होता है।