
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
ये कहानी भारतीय सिनेमा के उस सुनहरे दौर की है, जब अभिनय की दुनिया आज जैसी नहीं थी। इस सफर की शुरुआत होती है 30 सितंबर 1915 को पंजाब के नवांशहर से जिसे अब शहीद भगत सिंह नगर के नाम से जाना जाता है,
इसी शहर के रहने वाले निहाल चंद पुरी और वेद कौर के घर एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया- मदन लाल पुरी।
मदन पूरी का झुकाव बचपन से ही रंगमंच की तरफ़ था।
उनके अभिनय के सफर की शुरुआत साल 1936 में हुई थी। उन दिनों मदन पुरी के पिता सरकारी नौकरी में थे और उनका परिवार शिमला में रह रहा था।
मदन पुरी और बाद में सिनेमा के बड़े स्टार बने प्राण, दोनों ही उस समय शिमला के मशहूर एमेच्योर ड्रामेटिक क्लब के मेम्बर थे।
इसी क्लब के बैनर तले शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर के मंच पर माल रोड नाम के एक नाटक का मंचन किया जा रहा था।
उस दौर में महिलाओं का नाटकों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए महिलाओं के सारे किरदार भी पुरुष ही निभाते थे।
इस नाटक के हीरो थे मदन पुरी। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि उस नाटक में उनकी हीरोइन का किरदार निभाने वाला कोई और नहीं, बल्कि बाद में बॉलीवुड के सबसे बड़े विलेन बने अभिनेता प्राण थे…
साड़ी पहने, चेहरे पर मेकअप लगाए जब प्राण मंच पर मदन पुरी के सामने आए, तो दोनों ने ऐसा समां बांधा कि पूरा थियेटर तालियों से गूंज उठा।
मदन पुरी एक बेहद संभ्रांत परिवार से थे। उनके पिता एक बड़े सरकारी अधिकारी थे और वे बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनका बेटा फिल्मों में भांडों का काम करे। पिता के दबाव में आकर उन्होंने एक सरकारी नौकरी जॉइन कर ली। अपनी 6 साल की सर्विस के दौरान उनका ट्रांसफर शिमला और कराची जैसी जगहों पर हुआ।
बाद में, फिल्मों और न्यू थिएटर्स के प्रति अपनी दीवानगी के चलते उन्होंने जानबूझकर अपना ट्रांसफर कोलकाता करवा लिया, ताकि वे सिनेमा के करीब रह सकें।
कोलकाता में रहते हुए उन्होंने अपने चचेरे भाई और उस जमाने के महानायक के. एल. सहगल की मदद से दलसुख पंचोली की ब्लॉकबस्टर फिल्म खजांची के एक गाने में एक छोटी सी भूमिका निभाई,
वो गाना था- सावन के नजारे हैं…जिसमें मदन पुरी बाकी कलाकारों के साथ साइकिल चलाते हुए गाते नजर आ रहे थे।
फिल्म और गाना पूरे देश में सुपरहिट हो गए। जब ये फिल्म थियेटर में लगी, तो मदन पुरी के पिता भी उसे देखने पहुंचे। जैसे ही स्क्रीन पर साइकिल चलाते हुए मदन पुरी का चेहरा सामने आया, उनके पिता दंग रह गए…
वे हैरान थे कि बेटा कोलकाता में नौकरी कर रहा है, तो फिर वो लाहौर में बनी इस फिल्म के गाने में कैसे दिखाई दे रहा है?
मदन पुरी की चोरी पकड़ी जा चुकी थी, लेकिन उनके अभिनय की गाड़ी अब चल पड़ी थी।
मदन पुरी अपने छोटे भाई अमरीश Puri से उम्र में करीब 17 साल बड़े थे। जब मदन पुरी मुंबई आकर फिल्मों में एक स्थापित नाम बन चुके थे, तब अमरीश पुरी भी फिल्मों में किस्मत आजमाने मुंबई आए। शुरुआती दिनों में अमरीश पुरी को काफी संघर्ष करना पड़ा और वे बतौर हीरो रिजेक्ट भी हुए।
उस मुश्किल दौर में मदन पुरी ने अपने छोटे भाई का हाथ थामा। उन्होंने अमरीश पुरी को थिएटर से जुड़ने की सलाह दी ताकि वे अपने अभिनय को और निखार सकें।
उन्होंने ही अमरीश जी को फिल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीके सिखाए और निर्देशकों से मिलवाया। आगे चलकर दोनों भाइयों ने विधाता और ‘
जानी दोस्त जैसी कई हिट फिल्मों में स्क्रीन भी शेयर की।
अमरीश पुरी हमेशा मानते थे कि उनके करियर की मजबूत नींव रखने वाले उनके बड़े भाई मदन पुरी ही थे।
मदन पुरी परदे पर भले ही कड़क रोल करते थे, लेकिन असल जिंदगी में वे अनुशासन, समय की पाबंदी और शालीनता के पक्के थे।
उनके बेटे कर्नल कमलेश पुरी ने अपनी किताब माय फादर द विलन में एक किस्सा लिखा है।
एक फिल्म की shooting के दौरान बॉलीवुड के एक बहुत ही नामी और रसूखदार सितारे ने मदन पुरी के साथ बेहद बदतमीजी की और उन्हें भला-बुरा कहा।
मदन पुरी ने बेहद शालीनता से उनसे माफी मांगने को कहा, लेकिन उस स्टार ने घमंड में माफी मांगने से साफ मना कर दिया।
मदन पुरी को अनुशासनहीनता और बदतमीजी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी,, उन्होंने आव देखा न ताव, सेट पर मौजूद लोगों के सामने ही उस बड़े स्टार को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया था।
मदन पुरी को कभी भी प्राण या अमरीश पुरी की तरह सिर्फ एक क्रूर खलनायक के रूप में याद नहीं किया जाता। वे हिंदी सिनेमा के एक बेहद वर्सटाइल कैरेक्टर आर्टिस्ट थे, उन्होंने सच्चा झूठा’ में एक लाचार पिता और दीवार में एक संजीदा शख्स की भूमिका निभाकर दर्शकों को रोने पर मजबूर कर दिया।
उन्होंने लगभग 40 साल से अधिक लंबे फिल्मी करियर में 430 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।
सेट पर उनका व्यवहार इतना शालीन और दोस्ताना था कि जूनियर आर्टिस्ट से लेकर बड़े-बड़े स्टार्स तक, हर कोई उन्हें परिवार के सदस्य की तरह मानता था और उन्हें आदर से मैडी अंकल कहकर पुकारता था।
13 जनवरी 1985 को दिल का दौरा पड़ने के कारण 69 वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया था।
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