सिर्फ 40 दिन में अपने ही बंगले में शूट कर ली थी पूरी फिल्म गोलमाल

आज जन्मदिन है ऋषि दा का

प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

अमोल पालेकर ने साफ़ कह दिया था कि मैं फिल्म छोड़ दूंगा, लेकिन अपनी मूंछें नहीं काटूंगा…
पर उन्हें क्या पता था कि डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी ने कैमरे के पीछे पहले ही एक ऐसा ‘गोलमाल’ कर दिया है, जिसके आगे उन्हें घुटने टेकने ही पड़ेंगे।
जी हां, 1979 की क्लासिक फिल्म ‘गोल माल’ की सबसे बड़ी हकीकत यही थी कि फिल्म के हीरो अमोल पालेकर असल जिंदगी में अपनी मूंछें कटवाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे।

आज 30 सितंबर को ऋषिकेश मुखर्जी के जन्मदिन पर उनकी इस कल्ट क्लासिक फ़िल्म का किस्सा-

वैसे तो ऋषि-दा ने हमें आनंद, बावर्ची और चुपके चुपके जैसी कई यादगार फिल्में दीं। लेकिन उनकी फिल्म गोलमाल जब भी टीवी पर आती है, तो पूरा परिवार साथ बैठकर हंसने लगता है,

लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेट पकड़कर हंसाने वाली यह फिल्म ऋषि-दा ने अपनी जिंदगी के सबसे उदास दौर में बनाई थी?

दरअसल, साल 1977 में ऋषि-दा ने अमिताभ बच्चन के साथ एक बहुत गंभीर फिल्म बनाई थी आलाप। ऋषि-दा को इस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन यह बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई। इस असफलता से ऋषि-दा डिप्रेशन में चले गए। कई महीनों की उदासी के बाद उन्होंने तय किया कि वे एक ऐसी हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्म बनाएंगे जिसे देखते वक्त लोग अपने सारे दुख-दर्द भूलकर सिर्फ हंस सकें।
इसी सोच से गोल माल का जन्म हुआ।
फिल्म का मूल विचार उन्हें 1973 की एक बंगाली फिल्म कांचा मीठा से मिला था।
गोल माल’ बनाने का मूल विचार 1973 की एक बंगाली फिल्म ‘कांचा मीठा’ को देखने के बाद आया था. जिसमें मुख्य किरदार अपनी एक गलती छिपाने के लिए लगातार एक के बाद एक कई झूठ बोलता जाता है और खुद ही अपने बुने जाल में फंस जाता है. तब उन्होंने प्रसिद्ध लेखक सचिन भौमिक और राही मासूम रजा के साथ मिलकर एक स्क्रिप्ट तैयार की।

इस फिल्म की पूरी कहानी अमोल पालेकर की मूंछों पर टिकी है, रामप्रसाद की मूंछें होती हैं, जबकि उनके फर्जी जुड़वां भाई लक्ष्मणप्रसाद की मूंछें नहीं होतीं।

मजेदार बात ये है कि अमोल पालेकर असल जिंदगी में कभी मूंछें नहीं हटाना चाहते थे। वे अपनी मूंछों को लेकर बहुत पजेसिव थे। जब ऋषि-दा ने उन्हें स्क्रिप्ट सुनाई कि उन्हें आधी फिल्म में बिना मूंछों के रहना होगा, तो अमोल पालेकर पहले झिझक रहे थे।

तब ऋषि-दा ने मजाकिया अंदाज में उनसे कहा,
“अगर फिल्म को हिट कराना है, तो मूंछों की कुर्बानी देनी ही होगी। बिना मूंछ के जो भोलापन तुम्हारे चेहरे पर आएगा, वही इस कॉमेडी की जान बनेगा।”

ऋषि-दा के कहने पर वे मान गए और बिना मूंछ के उनका जो मासूम चेहरा सामने आया, उसने दर्शकों का दिल जीत लिया।
पूरी फिल्म में उनकी नकली मूंछों को बार-बार चिपकाया और निकाला जाता था, जो अपने आप में एक बड़ा टास्क था।

ऋषि दा को इंडस्ट्री में बहुत कंजूस माना जाता था, वो अपनी फ़िल्मों को कम बजट में बेहतरीन बनाने के लिए जाने जाते थे।
गोल माल का बजट भी बहुत कम था। ऋषि-दा किसी महंगे स्टूडियो में सेट लगाने का खर्च नहीं उठाना चाहते थे। उन्होंने इसका एक बेहद नायाब तोड़ निकाला। उन्होंने मात्र 40 दिनों के भीतर पूरी फिल्म बांद्रा में अपने ही बंगले पर शूट कर ली।
फिल्म में उत्पल दत्त (भवानी शंकर) का जो दफ्तर और घर दिखाया गया है, वह असल में ऋषिकेश मुखर्जी के घर के ही अलग-अलग हिस्से थे।

ऋषिकेश मुखर्जी एक जीनियस फिल्ममेकर थे और उन्होंने गोल माल में बड़े ही अनोखे और मजाकिया अंदाज में अपनी ही एक और फिल्म का प्रमोशन कर दिया था।

उसी वक़्त में ऋषि-दा अमिताभ बच्चन और राखी गुलजार को लेकर एक ड्रामा फिल्म बना रहे थे, जिसका नाम था जुर्माना

आपने फ़िल्म गोल माल के एक सीन में देखा होगा जब अमोल पालेकर कुर्ता सिलवाने के लिए एक दर्जी की दुकान पर जाते हैं, तो वहां असल में अमिताभ बच्चन एक फिल्म की शूटिंग कर रहे होते हैं।

तब दर्जी कहता है, देखो, वो बड़े स्टार अमिताभ बच्चन आए हैं।
वह फिल्म कोई और नहीं, बल्कि ऋषि-दा की अपनी ही अगली फिल्म जुर्माना थी। इस तरह उन्होंने गोल माल के अंदर ही अपनी दूसरी फिल्म का मजेदार प्रमोशन कर दिया था। जो उस दौर के सिनेमा के लिए बेहद नया और मजेदार प्रयोग था।

आने वाला पल जाने वाला है…ये गाना न सिर्फ फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा है, बल्कि हिंदी सिनेमा के इतिहास के सबसे बेहतरीन दार्शनिक गानों में से एक है। इसे आर. डी. बर्मन ने संगीतबद्ध किया था और गुलजार ने लिखा था।

इस गाने को किशोर कुमार ने गाया था,
किशोर कुमार अपनी जिंदादिल और तेज तर्रार गायकी के लिए जाने जाते थे। जब पंचम दा ने उन्हें इस गाने की धुन सुनाई, तो किशोर दा ने शुरू में मजाक करते हुए कहा कि वे इसमें कुछ योडलिंग या मजेदार हरकतें जोड़ना चाहते हैं। लेकिन ऋषि-दा और पंचम दा ने उनसे साफ कहा,
किशोर, ये गाना फिल्म की आत्मा है। इसमें एक ठहराव और जिंदगी की हकीकत है।

तब किशोर कुमार ने ऋषि-दा की बात मानते हुए अपनी मस्तीखोर छवि को बिल्कुल पीछे छोड़ दिया। उन्होंने इस गाने को इतनी संजीदगी और गहराई से गाया कि रिकॉर्डिंग रूम में मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
इस गाने की सादगी और गहराई का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि इस गाने के लिए गुलजार को सर्वश्रेष्ठ गीतकार और किशोर कुमार को बेस्ट प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था।

ऋषिकेश दा का सिनेमा सीधे दिल को छूता था क्योंकि उसमें हमारे और आपके जैसे आम परिवारों की सादगी होती थी।

जन्मदिन की शुभकामनाएं ऋषि-दा!

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