
प्रीति सिंह, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
साल 1970 के आस-पास की बात है। हिंदी सिनेमा के शोमैन राज कपूर बीमार थे और अस्पताल में एडमिट थे। तब एक इंसान रात भर सो नहीं पाया था और वो शख्स कोई और नहीं, बल्कि मशहूर फिल्ममेकर ऋषिकेश मुखर्जी थे..
राज कपूर और ऋषिकेश मुखर्जी के बीच इतनी गहरी दोस्ती थी कि राज कपूर उन्हें प्यार से बाबूमोशाय कहकर बुलाते थे।
उस रात ऋषिकेश मुखर्जी के मन में बार-बार एक ही खौफनाक ख्याल आ रहा था कि “अगर राज को कुछ हो गया, तो का क्या होगा?”
चूँकि ऋषि दा एक लेखक भी थे तो उन्होंने
मौत के इस डर, दोस्ती के इसी दर्द और जिंदगी को खुलकर जीने की इसी कशमकश को कागज पर उतार दिया।
जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे महान फिल्म बनी आनंद…
उस दौर में राजेश खन्ना देश के पहले ऑफिशियल सुपरस्टार बन चुके थे। उनके नाम का सिक्का चलता था और निर्माता-निर्देशक उन्हें अपनी फिल्म में लेने के लिए मुंहमांगी रकम देने को तैयार रहते थे। तब राजेश खन्ना अपनी फीस आठ लाख रुपये लेते थे,
जब उन्हें पता चला कि कई बड़े एक्टर्स से आनंद फ़िल्म छूटी है तो वो ऋषि दा के पास गए और उनसे कहा कि दादा , मैं आपकी फिल्म में काम करना चाहता हूँ।”
तब ऋषि दा ने कहा कि अगर मेरे साथ काम करना है तो मेरी तीन शर्तें माननी पड़ेगी..
पहली – चूँकि राजेश खन्ना के बारे में इंडस्ट्री में मशहूर था कि वे सेट पर काफी देर से आते थे। लेकिन ऋषि-दा के सेट पर अनुशासन का राज चलता था।इसलिए ऋषि दा ने कहा कि तुम्हें सेट पर टाइम पर आना होगा…
दूसरी – फिल्म की शूटिंग को बिना किसी रुकावट के पूरा करने के लिए उन्हें अधिक डेट्स देनी होंगी..
तीसरी शर्त ये कि फ़िल्म एक लाख रुपये में करनी होगी, क्योंकि ऋषि दा तब अपनी कंजूसी के लिए जाने जाते थे और वो बेहद कम बजट में अच्छी फ़िल्में बनाते थे,
तब राजेश खन्ना बिना कुछ कहे मान गए थे, जिसका उन्हें फल भी मिला जहाँ लोग उन्हें केवल एक रोमांटिक हीरो मानते थे ,वही इस फ़िल्म से एक बेहद गंभीर और मंझा हुआ अभिनेता मानने लगे।
ऋषि दा ने इस फ़िल्म की कहानी एक फ्लाइट में धर्मेंद्र को भी सुनाई थी … और उनके साथ पूरी प्लानिंग की “धरम, इस रोल को तुम करोगे, हम इसमें ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे…
लेकिन अगले दिन धर्मेंद्र ने अखबार में पढ़ा कि इस फ़िल्म के हीरो राजेश खन्ना होंगे, तब धर्मेंद्र ने खूब शराब पी, और फिर रात को नशे में ऋषि दा को फ़ोन किया और पूछा
“ ऋषि दा वो फिल्म कित्थे गई ? मेरा आनंद कहाँ है..?
ऋषि दा उन्हें समझाते रहे कि कल सुबह बात करेंगे.. प्लीज मुझे सोने दो धरम और खुद भी सो जाओ’.
लेकिन धर्मेंद्र कहाँ मानने वाले थे, वो पूरी रात उन्हें फोन मिलाते रहे ..
30 सितंबर 1922 को कलकत्ता में जन्मे ऋषिकेश मुखर्जी का फिल्मों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से साइंस और मैथ्स में ग्रेजुएशन किया और कुछ समय तक उन्होंने एक कॉलेज में बच्चों को गणित और विज्ञान भी पढ़ाया।
लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। 1940 के दशक में उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में अपना करियर बनाने की सोची और कलकत्ता के मशहूर न्यू थिएटर्स में कैमरामैन के तौर पर काम करना शुरू कर दिया…
यही उनकी मुलाक़ात फ़िल्म एडिटर सुवोध मित्र से हुई और उनके साथ ऋषि दा ने एडिटिंग का काम सीखा, और इसके बाद वे निर्देशक विमल रॉय के एडिटर बन गए…
उन्होंने बिमल रॉय की फिल्मों दो बीघा ज़मीन और देवदास की एडिटिंग की थी।
उनकी एडिटिंग इतनी कमाल की होती थी कि मशहूर गीतकार और निर्देशक गुलज़ार साहब ने एक इंटरव्यू में बताया था कि
ऋषि दा का काम करने का अलग स्टाइल होता है। वे एक्स्ट्रा शॉट्स या फिर एक्स्ट्रा एंगल में विश्वास नहीं करते और एडिटर होने की वजह से वे अपने दिमाग में ही बहुत सारे सीन एडिट कर लेते हैं।।वे सेट पर उतना ही शूट करते थे जितना फिल्म में चाहिए होता था, जिससे कभी रीलों की बर्बादी नहीं होती थी।
यहाँ तक कि वो फ़िल्मों के सीन तक अपने एक्टर्स से सीक्रेट रखते थे, वे सेट पर किसी भी एक्टर को पूरी कहानी या स्क्रिप्ट कभी नहीं बताते थे। वे सिर्फ उतना ही सीन समझाते थे जितना उस समय शूट करना होता था। उनका मानना था कि इससे एक्टर्स का रिएक्शन नेचुरल आता है।
एक इंटरव्यू में असरानी साहब ने बताया था कि हम फ़िल्म चुपके चुपके की शूटिंग कर रहे थे, ऋषि दा आए और मुझे सूट-बूट पहना दिए..
तभी धर्मेंद्र ड्राइवर के कपड़ो में आए और मुझे सूट में देखकर हैरान होते हुए बोले,
“ओए, मैं तेरा ड्राइवर बना हूँ क्या..? क्या है अगला सीन.? और ये सूट तुझे कैसे मिल गया..?
तभी वही दूर बैठे ऋषि दा ने कहा, ओ धर्मेंद्र उससे क्या पूछता है? उसे कुछ पता होता तो वो ख़ुद डायरेक्टर नहीं होता।
ऋषि दा ने साल 1957 में फ़िल्म मुसाफ़िर से बतौर डायरेक्टर शुरुआत की थी, लेकिन सफलता दूसरी फिल्म अनाड़ी से साल 1959 में मिली,
उन्होंने आनंद, सत्यकम, अनुपमा, अभिमान, आशीर्वाद, और नमक हराम, चुपके चुपके, गोलमाल, बावर्ची, खूबसूरत, गुड्डी, और किसी से ना कहना जैसी कई सुपरहिट फिल्में निर्देशित की..
उनके निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म 1998 में आई झूठ बोले कौआ काटे थी जिसमें अनिल कपूर और जूही चावला ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
फिल्मों के अलावा उन्होंने टेलीविजन के लिए भी कई बेहतरीन धारावाहिकों का निर्माण किया, जिनमें तलाश, हम हिंदुस्तानी, धूप छांव, रिश्ते और उजाले की ओर शामिल हैं….
42 से ज्यादा फिल्मों का निर्देशन, 7 फिल्मफेयर पुरस्कार, दादा साहब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण से सम्मानित ऋषिकेश मुखर्जी ने 27 अगस्त 2006 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
आपको ऋषिकेश मुखर्जी की कौन सी फिल्म सबसे ज्यादा पसंद है?
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