‎मेरा जो है वह मेरे पास‎ ही रहेगा

मुनि समयप्रभ जी ने कहा- जिस शरीर का हम जतन करते हैं अंत में उसकी ही सबसे ज्यादा दुर्गति होती है

‎राजनांदगाँव। खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर जी के सुशिष्य समयप्रभ सागर जी ने कहा कि मेरा जो है वह मेरे ही पास रहेगा। उसे मुझसे कोई ले नहीं सकता।  मैं एक आत्मा हूँ और मेरे पास मेरा शरीर है। शरीर मेरा है लेकिन मैं शरीर का नहीं हूं।
‎मीडिया प्रभारी विमल हाजरा ने बताया कि ज्ञान वल्ल्भ उपाश्रय भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में आज मुनि श्री समयप्रभ सागर जी ने कहा कि हम अपने रास्ते में बढ़ रहे हैं और इस रास्ते में हम मकान बना लेते हैं जिसे हम “मेरा” मकान कहते हैं। आखिर एक न एक दिन हमें इस मकान से निकलना ही है तो फिर यह मेरा मकान कैसे हो सकता है। मकान बनाना ही है तो ऐसा मकान बनाओ जहां से तुम्हे कोई नहीं निकाल सकता।
‎ मुनि श्री ने कहा कि जहां आपको शास्वत सुख मिल सकता है, वहां हम क्या मांगते हैं! हम अपनों के सुख स्वास्थ्य की कामना करते हैं किंतु शाश्वत सुख की कामना नहीं करते। हम अपने बच्चों को ठीक से संस्कार नहीं देते और कहते हैं कि बच्चा नासमझ है। उन्होंने कहा कि आखिर हमने बच्चे को समझाने की कब कोशिश की? हमने अपने बच्चों को केवल मां -बाप, भाई -बहन ही सिखाया है जिससे हमारा वास्तविक रिश्ता है उसके बारे में हमने क्या बताया? हमारा काम हमें स्वयं ही करना है। उन्होंने कहा कि आपको जो हासिल करना है, वो कर लो। शरीर को पाल-पोसकार आपने बड़ा किया किन्तु अंत में सबसे ज्यादा दुर्गति उसीकी होती है। आप अपने आत्मा के स्वरूप को समझे और मोक्ष मार्ग की ओर आगे बढ़े।